30/11/2011

देश कों अपनी प्रतिभा की कदर नहीं

भारतीय कबड्डी टीम ने इस बार कबड्डी का वर्ल्डकप जीता तो मुझे बहुत ख़ुशी हुई. सच मानो तो मै फुला नहीं समा पाया. बचपन में मै भी कबड्डी खेला करता था लेकिन वो मेरा देहाती खेल था इसीलिए में उसको ज्यादा तवज्जो देता था. लेकिन यह कभी नहीं सोचा था कि भारतीय टीम कभी कबड्डी में भी वर्ल्डकप जीतकर लाएगी वो भी महिला टीम . एक बार पुरुषो से तो उम्मीद की जा सकती थी लेकिन महिलाओ से नहीं, हमारे भारतीय ग्रामीण खेल गुल्ली डंडा, कबड्डी, खो - खो और हाकी ये तमाम ऐसे खेल है जो विदेशी खेलो के एकदम बराबर होते है जैसे टेबिल टेनिस, शतरंज. बेडमिन्टन इत्यादि . भारत न जाने क्यों इस तरह के खेलो कों नदारद रखता है क्या उसे बताने में यह शर्म आती है कि भारत मै इस तरह के खेल खेले जाते है?


जिस ग्रामीण खेल के आसरे भारत ने कबड्डी वर्ल्डकप जीता उसी भारत में आज भी बहुत सी ऐसी प्रतिभाए छिपी है जो राष्ट्रीय स्तर पर अपना परचम लहरा सकती है लेकिन भारत का खेल मंत्रालय ऐसे खेलो को कभी बढ़ावा नहीं देता. भारतीय हाकी खेल हमेशा से किसी न किसी विवादों में फंसी रहती है चाहे वो हाकी टीम के खिलाडियों के पैसो का मामला हो या फिर हाकी कोच पर लगे यौन शोषण का आरोप हो, कही न कही ये तमाम ऐसे मुद्दे है जो भारतीय खेलो कों पीछे धकेल रहे है. जिनका परिणाम ज्यादा दूरगामी नहीं निकल पाता. हमारे खेलो की दुर्दशा भी यही बताती है कि इन खेलो का भविष्य कुछ जायदा खास नहीं है.भारतीय पुरुष और महिला कबड्डी खिलाडियों ने अपनी ताकत का लोहा मनवाकर यह साबित कर दिया की भारतीय कबड्डी टीम किसी से कम नहीं है. लुधियाना (पंजाब) के गुरुनानक स्टेडियम में पुरुष वर्ग और महिला वर्ग ने कबड्डी का वर्ल्डकप जीतकर एक नया इतिहास रच दिया. एक ओर पुरुष वर्ग ने कनाडा को 59 -25 से मात देकर वर्ल्डकप पर अपना कब्ज़ा किया तो वही दूसरी ओर महिला वर्ग के खिलाडियों ने अपनी ताकत दिखाते हुए इंग्लेंड को 44 -17 से पटखनी देकर कबड्डी वर्ल्डकप का ताज़ा अपने नाम कर लिया ।


भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब किसी भारतीय महिला टीम ने कबड्डी का वर्ल्डकप जीता हो. दर्शको से भरे खचाखच स्टेडियम में भारतीय टीम के नारों की गूंज चारो ओर से सुनाई पड़ रही थी. जिससे भारतीय खिलाडियों के हौसले बुलंद थे. भारतीय पुरुष टीम ने कनाडा कों हराकर एक स्वर्ण पदक और दो करोड़ रुपए जीते लेकिन उधर महिला खिलाडियों ने एक स्वर्ण पदक के साथ-साथ 25 लाख रुपए की नकद धनराशि जीती. कबड्डी वर्ल्डकप जीतने की ख़ुशी में पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने दोनों वर्गो के खिलाडियों कों सरकारी नौकरी देने का वादा किया. लेकिन अब सवाल यही से पैदा होता है कि जिस भारतीय महिला टीम के खिलाडियों ने पहली बार कबड्डी वर्ल्डकप जीता, आखिर खिलाडियों को एयरपोर्ट तक पहुचाने के लिए एक भी गाड़ी उपलब्ध नहीं कराई जा सकी. सीएम भी अपना वादा निभा कर चलता बने, आख़िरकार इन खिलाडियों का क्या कसूर था ? जो कई घंटो तक अपना पच्चीस लाख रुपए का चेक और वर्ल्डकप ट्राफी लिए हुए सड़क पर एयरपोर्ट तक जाने के लिए ऑटो का इंतज़ार करते रहे, उनके साथ न तो कोई आला अधिकारी थे ओर न ही कोई सुरक्षाकर्मी. अब आप यही से अंदाज़ा लगा सकते है कि भारतीय खिलाडियों की इज्ज़त किस तरह से की जाती है यही कारण है कि भारतीय खिलाडी भारतीय खेलो कों छोड़कर विदेशी खेलो की ओर क्यों रुख कर रहे है? उपविजेता टीम को हमारी सुरक्षा और ट्रेवल्स एजेंसियों ने उनको एयरपोर्ट तक वातानुकूलित बस से पहुचाया. लेकिन कबड्डी विश्वविजेता टीम सड़क पर ही टहलती रही।


आखिर देश जा किधर रहा है जो उसे अपनी प्रतिभा की ज़रा भी कदर नहीं. ज़रा याद कीजिएगा इसी साल के अप्रैल महीने में जब भारतीय क्रिकेट टीम ने वर्ल्डकप जीता तो उनके मैदान से कमरे तक सुरक्षाकर्मी हर तरह से मुस्तेद थे कही हमारे खिलाडियों की सुरक्षा में कोई सेंध न लग जाए. क्रिकेट टीम लिए रात की डिनर पार्टी हो या फिर डांस पार्टी हर तरह की सुविधाए उनको मुहय्या कराई जाती है लेकिन कबड्डी विश्वकप विजेता टीम के खिलाडियों के लिए ऐसा कुछ भी नहीं, सवाल तो यहाँ मीडिया पर भी खड़ा होता है. जब भी कोई भारतीय खिलाडी किसी विदेशी खेलो में अपना अच्छा प्रदर्शन करता है तो हमारा प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया उसको पूरा कवरेज देता है।


मुझे तो कभी - कभी यह देखकर बड़ा ताजुब होता है कि जब खिलाडियों के घर तक के पहुचने की खबर हम तक पहुचती है. लेकिन अगर कोई खिलाडी भारतीय खेलो में अच्छा प्रदर्शन करे तो वह हमारे मीडिया के लिए चर्चा का विषय ही नहीं होता. शायद इसीलिए हमारी कबड्डी वर्ल्डकप विजेता टीम मीडिया पर कुछ खासा असर नहीं छोड़ सकी. वर्ल्डकप विजेता भारतीय टीम देश के कुछ गिने चुने अखबारों की ही लीड खबर बनी या फिर वह खेल पेज तक ही सीमित रही. वर्ल्डकप जीतने के एक दिन बाद खिलाडियों कों मीडिया ने पूरी तरह से नदारद कर दिया. आखिर कबड्डी वर्ल्डकप विजेता खिलाडियों के साथ ही ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? क्रिकेट वर्ल्डकप जीती भारतीय टीम का कवरेज मीडिया ने खिलाडियों के एयरपोर्ट से लेकर उनके घर तक पहुचने की खबर हमको लगातार पहुचाई इस कवरेज में दोनों मीडिया की भूमिका लगभग 50 - 50 फीसदी रही. समझ नहीं आता भारत की ये आदत कब सुधरेगी जो विदेशी खेलो कों बढ़ावा देकर उनको प्रोत्साहित करता है. जबकि हमारे ही देश में उपज रहे भारतीय खेलो को न जाने क्यों प्रोत्साहित नहीं करता ?

07/11/2011

मुझे भारतीय होने पर गर्व है


महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि. वर्धा में विदेशी शिक्षको के लिए हिंदी प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन 31 अक्टूबर कों किया गया. जिसका उद्घाटन विवि के कुलपति विभूति नारायण ने किया . दस दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में देश के हिंदी विशेषज्ञ, विदेशी शिक्षको कों हिंदी की बारीकियो के बारे में और हिंदी पढ़ाने के लिए किस तरह की दिक्कते सामने आती है. इन सब बातो पर चर्चा जारी है. न्यूजीलेंड से आई भारतीय मूल की सुनीता नारायण जो न्यूजीलेंड के वेलिंग्टन हिंदी स्कूल में पढ़ाती है. सुनीता इस कार्यशाला के ज़रिए हिंदी की बारीकियो कों सीख रही है. विवि में एम. फिल. जनसंचार के शोधार्थी ललित कुमार कुचालिया की " सुनीता नारायण" से एक खास बातचीत -

प्रश्न 1: न्यूजीलेंड में हिंदी भाषा कों लेकर किस तरह की मान्यता है ?

उत्तर : न्यूजीलेंड में सभी लोग हिंदी से परिचित है अभी वहा पर हिंदी की ऐसी कोई औचारिक पढाई तो नहीं है लेकिन इतना ज़रूर है जो लोग यह जानते है की भारत में हिंदी सबसे ज्यादा बोली जाती है. वही लोग हिंदी कों मान्यता देते है .

प्रश्न 2: न्यूजीलेंड में पढाई जाने वाली हिंदी अन्य देशो के मुकाबले किस तरह से भिन्न है ?

उत्तर : जैसा की मैंने पहले कहा की हिंदी की अभी कोई ओपचारिक पढाई तो नहीं है लेकिन 9 से 10 कुछ छोटी - २ सामुदायिक , पाठशालाए है जहा अलग से हिंदी पढ़ाने के लिए हर शनिवार और रविवार की शाम कों क्लास लगती है . इसके आलावा कही - कही पर युवा और बड़े लोगो कों हिंदी पढ़ाने के लिए अलग से क्लासे चलती है. और रही बात अन्य देशो के मुकाबले हिंदी पढ़ाने की तो हिंदी भाषा कों पढ़ाने के लिए हर देश तरह-२ की तकनीके अपनाता है . ये तो छात्रो पर निर्भर करता है कि वो किस तरह से पढ़ते है.

प्रश्न 3 : कितने ऐसे संस्थान है जो हिंदी कों प्राथमिकता देते है ?

उत्तर : कुछ पाठशालाओ के अलावा धार्मिक, सामाजिक संस्थाए है जो धर्म, सभ्यता और संकृति के साथ भाषा कों भी जोड़ देते है. धार्मिक संस्थाए रोमन लिपि में लिखकर बच्चो कों हिंदी सीखाती है. कभी- कभी जब मै उनका प्रोत्साहन करने की लिए वहा जाती हूँ और उनको देवनागरी में लिख कर बताती हूँ तो वो बड़े ही खुश होते है.

प्रश्न 4 : न्यूजीलेंड का मीडिया हिंदी से किस तरह जुडा है, चाहे वह प्रिंट मीडिया या फिर इलेक्ट्रोनिक मीडिया हो या कोई अन्य जनमाध्यम ?

उत्तर : न्यूजीलेंड में ऐसा कोई न्यूज़ पेपर नहीं है जो हिंदी से जुडा हो लेकिन हाँ इतना ज़रूर है. मोर्य चैनल पर कभी कभी हिंदी की फिल्मे दिखाए जाती है और कुछ ऐसे क्षेत्रीय टीवी चैनल है जिन पर भारत से प्रसारित होने वाले ज़ी टीवी के लगभग सभी कार्यक्रम दिखाए जाते है. ज़ी टीवी की लोकप्रियता वहा भारतीयों के बीच सबसे अधिक है, बहुत से लोग ज़ी टीवी पर आने वाले सीरियल से ही जुड़े रहते है.

प्रश्न 5 : न्यूजीलेंड के लोगो में हिंदी की दिलचस्पी किस तरह की है ?

उत्तर : मुझे कभी - कभी यह सुनकर बड़ा ही अजीब लगता है कि हमारे भारतीय लोग हिंदी कों उतनी सहजता से नहीं लेते जितना उन्हें लेना चाहिए. उन्हें लगता है कि अगर हम हिंदी नहीं सीखेंगे तो हमारा सिर ऊँचा नहीं होगा लेकिन ऐसा नहीं है. आप ज़रा सोचिए में जिस देश में रहती हूँ वहा हिंदी रोज़ तो इस्तेमाल नहीं होती लेकिन जो लोग हिंदी में विश्वास करते है वो अपने बच्चो कों और अपने आपको इसमें लीन रखते है .

प्रश्न 6 : न्यूजीलेंड में रहने वाले भारतीय अपने त्योहारों कों किस तरह से मनाते है ?

उत्तर : मै खुद एक भारतीय होने के नाते अपने सभी त्योहारों कों भारतीय परंपरा के अनुसार मनाती हूँ. न्यूजीलेंड में सभी लोग अपने-२ त्योहारों कों बड़ी ही धूम धाम से मनाते है. न्यूजीलेंड के आकलेंड, वेलिंग्टन, किंग्स्टन जैसे शहरों में दीवाली के मौके पर मेले लगते है. ये सभी योजनाए वही के लोगो दुवारा तय की जाती है. न्यूजीलेंड की "Aozia Newzealand Foundation" संस्था जिसको वहा की सरकार दुवारा फंडिंग किया जाता है. वही इस तरह के कार्यक्रमों की योजना बनाती है, जो चीनी और भारतीय त्योहारों कों बड़ा ही महत्व देती है. दुर्गा नवरात्रों में वहा के बाज़ार भारतीय बाजारों की तरह सजाए जाते है. तभी तो सभी त्यौहार बड़े ही उत्साह के साथ मनाये जाते है. किसी भी तरह का ऐसा कोई कोई बंधन नहीं है चाहे होली का त्यौहार हो, या फिर ईद , बैशाखी का त्यौहार ही क्यों न हो ? मै तो यह मानती हूँ कि भारत से दूर रहकर अपने त्योहारों कों मनाने का अलग ही मजा होता है.

प्रश्न 7 : हिंदी पढानें में न्यूजीलेंड के सामने किस तरह की दिक्कते आती है ?

उत्तर : दिक्कते तो बहुत है सही ढंग से जो पढाना है. हम मोरिशस, फिजी और भारत से जो पाठ्यक्रम मंगाते है हमें उस पर कई बार विचार विमर्श करके सोचना पडता है कि बच्चे हिंदी सीख भी पाएंगे की नहीं, सब कुछ अंग्रेजी माध्यम होने के कारण उनको हिंदी पढ़ा पाना बहुत ही मुश्किल है. इस बार से खोली गई तीन शाखाओ में से एक शाखा जिसमें हिंदी पढने छात्रो की संख्या बढती जा रही है. हमारे पास सामग्री है पर हिंदी पढ़ाने के लिए उतने टीचर नहीं है. कभी- कभी तो मै सोचती हूँ कि ये सब कैसे हो पाएंगा? लेकिन जैसे - तैसे करके में इसका समाधान निकाल लेती हूँ .

प्रश्न 8 : कितने ऐसे संस्थान है जहा हिंदी कि पढाई होती है ?

उत्तर : देखिए जैसाकि मैंने पहले कहा था कि 9 से 10 छोटी - छोटी ऐसी पाठशालाए चलती है जहा पर हिंदी की पढाई होती है. न्यूजीलेंड का सबसे बड़ा नगर आकलेंड जहा सबसे अधिक भारतीय ही रहते है. हिंदी पढने वालो कि तादात यहाँ लगभग 500 से 600 है. मै जिस वेलिंगटन हिंदी स्कूल में पढ़ाती हूँ वहा पर भी काफी तादात में लोग हिंदी पढ़ाने के लिए आते है . इस बार हमने अलग - २ शहरों में तीन शाखाए खोली है जिसमे हिंदी की पढाई होती है.

प्रश्न 9 ; भारत - न्यूजीलेंड के संबंध आप किस तरह से देखती है ?

उत्तर : न्यूजीलेंड के लोग भारत कों बहुत ही पसंद करते है. इसीलिए जब में अपने छात्रो से पूछती हूँ कि आप हिंदी क्यों सीखना चाहते हो तो वे कहते है कि हम हिंदी सीखकर भारत में आगे की पढाई करना चाहते है और हम भारत कों प्रेम भी करते है. अगर व्यापार की द्रष्टि से देखे, तो दोनों देशो के बीच आपसी संबंध कुछ वर्षो में ओर भी बेहतर हुए है. न्यूजीलेंड के प्रधानमंत्री जॉन के जब भारत यात्रा पर आए तो वहा के लोगो कों भारत से ओर भी ज्यादा उम्मीद बांध गई . कितने ही ऐसे एनजीओ है जो भारत आकर अपनी सेवा देते है. जब गैर भारतीयों लोगो कों में भारत से जुड़ा हुआ पाती हूँ, तो मुझे बहुत ही ख़ुशी होती है.

प्रश्न 10 : जैसाकि आप ने पहले बताया की मै खुद एक भारतीय हूँ फिर आपका न्यूजीलेंड कैसे जाना हुआ ?

उत्तर : मेरे पूर्वज यूपी के प्रतापगढ़ जिले के पथरा गाँव से थे जो बहुत पहले ही फिजी में आकर बस गए थे. मै उनकी तीसरी पीढी से हूँ. पिछली बार जब में अपने गाँव गई तो अपने परिवार वालो के बीच पाकर मुझे बहुत ही अच्छा लगा. अब मै बार - बार अपने गाँव आना चाहती हूँ, क्योंकि मुझे भारतीय होने पर बड़ा ही गर्व महसूस होता है कि भारत से दूर रहकर मै विदेश में हिंदी पढ़ाती हूँ.

www.mediaaagblogspot.com ( मेरे विचार) से बातचीत करने के लिए आपने समय निकला इसके लिए आपका बहुत -२ शुक्रिया .
- जी धन्यवाद

03/11/2011

इंदिरा गाजिएवा से बातचीत / सोवियत संघ के विघटन के बाद भारतीय भाषाओं की स्थिति अच्‍छी हुई



म.गा.अं. हि. विवि. वर्धा में विदेशी शिक्षको के लिए हिंदी प्रशिक्षण कार्यशाला का आयोजन ३१ अक्टूबर कों किया गया.. दस दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में देश के हिंदी विशेषज्ञ ईन विदेशी शिक्षको कों हिंदी की बारीकियो के बारे में बतायंगे. कार्यशाला में हिस्सा लेने आई रूस की इंदिरा गाजिएवा जो रूस के रुसी मानवीय सरकारी विवि में हिंदी पढ़ाती है. इस खास मौके पर एम. फिल. जनसंचार के शोधार्थी ललित कुमार कुचालिया ने " इंदिरा गाजिएवा " से बातचीत की. उसी के कुछ अंश --


प्रश्न - रूस में हिंदी के प्रति युवाओ में किस तरह की लोकप्रियता है ?


उत्तर - जहा तक लोकप्रियता का सवाल है सबसे पहले तो मै यह कहना चाहती हूँ रुसी लोगो कों भारतीय संस्कृति अच्छा लगना. दूसरा दोनों देशो के आपसी मैत्री संबंध अच्छे होना, ये दोनों ही बाते उनको भाँति है. लेकिन रुसी लोग जब भारत आते है चाहे टूरिस्ट के उद्देश्य से आए, चाहे व्यापार के उद्देश्य से आए या फिर पढाई के उद्देश्य से भारत आए तो कही न कही ये सब चीजे उनको अपनी और आकर्षित करती है. इसीलिए वहा के युवाओ मै हिंदी के प्रति काफी लोकप्रियता बनी हुई है ।


प्रश्न - सोवियत संघ के दौरान रूस मै हिंदी और उर्दू के काफी स्कूल थे लेकिन अब क्या स्थिति है?


उत्तर - देखिए जब से सोवियत संघ अलग हुआ है तब से स्थिति में काफी सुधार आया है. इससे पहले रूस के कई स्कूलों में हिंदी, उर्दू पढाई जाती थी लेकिन अब इनके अलावा भारत में बोली जाने वाली तमिल, बंगला, और मराठी भाषाए रूस के छ: विवि में पढाई जाती है. आप देखिए की सोवियत संघ के खत्म होने बाद कितनी भाषाए रूस में पढाई जाने लगी जबकि पहले ऐसा संभव नहीं था. और मै तो मानती हूँ की रूस के लिए यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है .


प्रश्न - रूस में हिंदी कों पढ़ाने के लिए हिंदी व्याकरण - अनुवाद के किस ढ़ाचे का उपयोग किया जाता है ?



उत्तर - रूस में हिंदी पढ़ाने के लिए इतने टीचर ही कहा थे कम ही लोग थे जो हिंदी साहित्य के बारे जानकारी रखते थे लेकिन आज भी हिंदी पढ़ाने के हिंदी साहित्य का सहारा लिया जाता है. कुछ वर्षो में हिंदी व्याकरण और अनुवाद का ढ़ाचा एक मौखिक रूप धारण का चुका है. लोग मौखिक ही बोलना चाहते है लिखना नहीं इसीलिए रुसी के युवा 6 महीने या एक साल में ही हिंदी सीखने की लालसा रखते है. एक तरह से देखा जाए तो हिंदी सीखने कों लेकर उनमे होड़ मची है. हिंदी पढ़ाने के लिए पाठ्य पुस्तक अमेरिका , ब्रिटेन से मंगाई जाती है लेकिन जो किताबे रुसी विद्वानों दुवारा लिखी गई उनकी हिंदी कुछ अलग ही तरह की है जिसको पढ़ाने में दिक्कत आती है लेकिन अब ऐसा नहीं है



प्रश्न - रुसी मीडिया का हिंदी भाषा के प्रति क्या नजरिया है ?


उत्तर - कोई ऐसी खबर , सूचना, जानकारी है की हिंदी विश्व भाषा होनी चाहिए . मै एक हिंदी टीचर होने के नाते इस बात से सहमत हूँ की या फिर मेरी दूसरी राय है कि भविष्य में शुद्ध इंग्लिश और हिंदी नहीं चलने वाली. बल्कि हिंग्लिश भाषा प्रचलन में आएगी जिसको इंग्लिश और हिंदी से मिलाकर बनाया जायेगा. शुद्ध हिंदी तो साहित्य में ही सिमट कर रह जाएगी. हिंग्लिश का ही भविष्य उज्जवल है. बीस सालो के दौरान रुसी भाषा एकदम परिवर्तन आया है. क्योंकि ये सब सूचना तकनीकी क्रांति की देन है. आप देखेंगे रुसी मीडिया में हर महीने हिंग्लिश भाषा के शब्द देखने और सुनने कों मिल जायेंगे. वहा की न्यूज़ पेपर, इंटरनेट न्यूज़ पोर्टल और इलेक्ट्रोनिक मीडिया में भी हिंग्लिश के शब्द काफी प्रचलित है.


प्रश्न - भारतीय खबरों कों रूस में किस तरह से पेश किया जाता है ?



उत्तर - जब तक सोवियत संघ था तब वहा पर कम्युनिस्ट न्यूज़ पेपर चलता था जिसका नाम "जनयुग" था जो ज्यादातर भारतीय खबरों कों प्राथमिकता देता था. लेकिन उस न्यूज़ पेपर कों केवल वही लोग पढ़ते थे जो हिंदी पढना और बोलना जानते थे. हाल ही में रूस में इस तरह का कोई न्यूज़ पेपर नहीं है जो भारतीय खबरों कों प्राथमिकता दे. भारत में जब से टीवी की शुरुआत हुई उसी दौरान से भारतीय खबरों कों इंटरनेट के ज़रिए उठाकर दिखाया जाता है.


प्रश्न - भारत की कला संस्कृति से आप कितनी प्रभावित है?



उत्तर- भारतीय कला संस्कृति के बारे मै बंया कर पाना थोडा ही मुश्किल है विषय ही इतना बड़ा है. वैसे हर हफ्ते मास्को के रूसी-भारतीय सांस्कृतिक संगठन "दिशा", भारतीय दूतावास, सेंट्स पिटरबर्ग में भारतीय कला संस्कृति के कार्यक्रमों कों हम लोग देखने के लिए जाते है. जो लोग नृत्य, कलाकार वहा आते है. उनको देखते है, उनके बारे में पढ़ते है. उनसे काफी कुछ सीखने कों मिलता है. अभी एक दो महीनो से मास्को में कला संस्कृति के कार्यक्रम हो रहे है भारत के अलग -२ प्रदेशो के कलाकार वहा पर कार्यक्रम कि प्रस्तुति दे रहे है.


प्रश्न - भारत- रूस के संबंध के बारे में आप क्या कहना चाहेंगी ?


उत्तर- देखिए हम दोनों देश हमेशा से एक भाई - बहन की तरह है. रुसी लोग, जो अब सोवियत संघ में चले गए है वो भी भारत कों काफी मानते है. जब हम लोग जनवरी में गोवा घूमने, हिंदी दर्शन सीखने या नृत्य सीखने की लिए यहाँ आते है तो हम आपने आपको कही न कही भारत से जुड़ा हुआ पाते है. इसीलिए में कहूँगी कि भारत और रूस के संबंध हमेशा से अच्छे है


प्रश्न - रूस के कितने विवि में हिंदी पढाई जाती है ?


उत्तर - रूस के छ: विवि में हिंदी पढाई जाती है जो राज्य सरकार के अधीन है।


- http://www.mediaaagblogpsot.com/ से बातचीत करने के लिए आपने समय निकला इसके लिए आपका बहुत -२ शुक्रिया



- इंदिरा गाजिएवा - जी धन्यवाद



02/11/2011

अंतरराष्ट्​रीय हिंदी विवि वर्धा में विदेशी शिक्षको की कार्यशाला का आयोजन


म। गा.अं. हि. विवि वर्धा में 31 से 09 नव. तक चलने वाली विदेशी शिक्षको के लिए अभिविन्यास कार्यशाला का उद्घाटन कुलपति विभूति नारायण राय ने किया. दस दिनों तक चलने वाली इस कार्यशाला में श्रीलंका, मोरिशस, ज़र्मनी, क्रोशिया, बेल्जियम, चीन, न्यूजीलेंड ,रशिया, हंगरी, के शिक्षक हिस्सा ले रहे है . विवि. में विदेशी शिक्षको के लिए यह कार्यक्रम दोबारा हो रहा है, इसी साल ३ से 15 जनवरी कों यहाँ पहला आयोजन कराया गया था .


इस कार्यशाला के अंतर्गत विदेशी शिक्षको के लिए यह आयोजन इसलिए ज़रूरी है कि जिस उद्देश्य के साथ विदेशी छात्र बड़े पैमाने पर हिंदी सीखने के लिए भारत आते है। और जब यहाँ से हिंदी सीखकर स्वदेश जाते है, तो क्या वे उन उद्देश्यों का पालन करते है या फिर दुनिया भर के विवि और संस्थानों में हिंदी पढ़ाने के लिए जिस तरह की समस्याए आती है उसमे महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विवि. भी अपनी अहम भूमिका निभाना चाहता है. कुलपति राय बताया कि दुनिया भर के 150 विवि में हिंदी सबसे ज्यादा पढाई जाती है और विश्व की सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषाओ में से एक है.

विवि. के प्रतिकुलपति एवं विदेशी शिक्षण प्रकोष्ठ के प्रभारी प्रो. ए. अरविन्दाक्षन का कहना है की विदेशो के विभिन्न विवि. में हिंदी पढ़ाने वाले शिक्षको के लिए यह दूसरा आयोजन है इससे पहले प्रथम आयोजन में मोरिशस, ज़र्मनी, चीन ज़र्मनी, बैंकाक आदि विदेशी शिक्षको से हमे अच्छा परिणाम मिला. इसीलिए उन्होंने इस प्रकार के आयोजन की तारीफ भी की थी. दस दिन तक चलने वाली इस कार्यशाला में हिंदी के एतिहासिक परिप्रेक्ष्य, वर्तनी, वाक्य रचना, सिद्धांत, हिंदी भाषा प्रोद्धोगिकी और शिक्षण सामग्री निर्माण आदि विषयों पर चर्चा होगी. समय - २ पर देश भर से हिंदी के विशेषज्ञो कों यहा बुलाया जायेगा जो इन्हें हिंदी के बारे में काफी विस्तार से बतायंगे.


11/10/2011

क्या नल के पानी से बुझेगी याकूब की प्यास............... ?




उत्तर प्रदेश में विधायको कों पार्टी से निकाले जाने का सिलसिला अभी लगातार बना हुआ है. जुमा -२ आठ दिन भी नहीं हुए थे की बसपा सुप्रीमो मुख्यमंत्री मायावती ने केबिनेट के शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र और श्रम मंत्री बादशाह सिंह कों मंत्री पद से हटा दिया. जुर्म दोनों मंत्रियो का बस इतना है कि लोकायुक्त की जाच में उन्हें दोषी पाया गया . बसपा पार्टी जिन दलितों और पिछडो वर्गों के आसरे उ. प्र. में राज कर रही है. उन्ही कों फिर से लुभाकर, दागदार मंत्रियो और भ्रष्ट्र नेताओ कों पार्टी से बाहर निकाल कर साफ़ छवि बनाने में जुटी है. और इन सब के बीच मायावती अपनी चुनावी बिसात भी बिछाने में भी लगी हुई है. मायावती के इन कड़े तेवर कों देखते हुए पार्टी का हर नेता खोफ खाया हुआ है. माया केबिनेट मंत्रियो की संख्या घटकर अब चार हो गई है.जिसमे से धर्मार्थ मंत्री राजेश त्रिपाठी, पशुपालन मंत्री अवधपाल यादव की भी छुट्टी कर दी गई .

आठ दिनों पूर्व मेरठ शहर विधायक हाजी याकूब कुरैशी कों बसपा से निष्कासित करने का मामला सामने आया था , हाजी याकूब सिखों पर बेहूदी टिप्पणी करने के मामले में पार्टी से निष्कासित किये गए है , याकूब के लिए अब बड़ा सवाल ये पैदा होता है की वे अपनी नवगठित यूडीएफ पार्टी कों किसके आसरे चलाए, वैसे भी पार्टी कों आगे बढ़ने की लिए जनाधार की आवश्यकता होती है वो याकूब के पास है नहीं, पार्टी चले तो चले किसके आसरे, सवाल बड़ा ही मुश्किल हैं. अब याकूब अपनी राजनीतिक प्यास कों बुझाये तो बुझाये कैसे ? सवाल ये भी बड़ा दिलचस्प है ? याकूब के पास बस एक मात्र विकल्प था, अजित सिंह की आरएलडी पार्टी, जिससे उनकी राजनीतिक प्यास बुझ सकती है, अंत में प्यासे कों नल के पास जाना ही पड़ा, याकूब कों पार्टी से निकलने के बाद कयास तो यही लगाये जा रहे थे कि याकूब अजित से हाथ मिला सकते है.लेकिन मौका परस्ती लोग मौका कभी गवाना नहीं चाहते

मेरठ के फैज़ ए - आम इंटर कालिज के मैदान में याकूब ने "मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत" का आयोजन कराया, इस आयोजन का सारा काम याकूब और उसके बेटे हाजी इकराम कि देख रेख में हुआ, जहा याकूब ने अपने बेटे हाजी इकराम कों इसी महापंचायत के ज़रीय आगामी विधानसभा चुनाव के लिए परमोट किया. तो वही राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजित सिंह ने भी इस महापंचायत में शिरकत ली. मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत में इस तरह से अजित सिंह का शरीक होना कही न कही यही दर्शाता है की याकूब अब अजित सिंह के नल से अपनी राजनीतिक प्यास बुझाएंगे. जब मुस्लिम उलेमाओं को याकूब की असलियत पता चली तो उन्होंने इस महापंचायत कों राजनीति का अखडा बताकर इसका बहिष्कार कर दिया.

क्या फैज़ - ए आम इंटर कालिज का वही मैदान याकूब के लिए फिर से राजनीतिक भविष्य की नई ईबारत लिखेगा ? यही सवाल अब हर उस शख्स के ज़ेहन में गूंज रहा है जो यूडीएफ पार्टी से जुड़े है. अब से पहले याकूब ने इसी मैदान में कई सभाए की है. लेकिन इस बार फिर से मुस्लिमो कों लुभाने के लिए याकूब ने एक नई चाल चली, या यूँ कहे कि "मुस्लिम - किसान गठबंधन" की नई राजनीति, जो आगामी विधानसभा चुनाव में देखने कों मिल सकती है ( खासकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में). याकूब के पास आरएलडी पार्टी ही एक मात्र विकल्प के रूप में उनके सामने थी. जिसके आसरे राजनीति में घुसा जा सके. याकूब ने अपनी राजनीति के शुरुआत जिस पार्टी से की थी उस पार्टी के भविष्य पर के बदरी के बादल छटने का नाम नहीं ले रही है. आए दिन उसके मंत्रियो का घोटाले और भ्रष्टाचार में संलिप्त पाये जाना हाजी याकूब कों रास नहीं आया. इसीलिए याकूब का कांग्रेस में जाने का मन नहीं था. याकूब के लिए आरएलडी ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जहाँ उनको जगह मिल सकती है. मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत के बहाने याकूब ने अजित सिंह कों इस आयोजन में बुलाकर यहा जता दिया की याकूब अब आरएलडी के नल से पानी निकालेंगे .

आखिर इन सब के बीच याकूब की मंशा अपने बेटे कों सरधना विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाने कीऔर खुद कों मेरठ शहर की किसी भी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाने की थी, लेकिन अजित सिंह की ख़ामोशी कुछ ज्यादा कह तो नहीं पाई,पर हाँ अजित ने मंच से इतना ज़रूर कहा की याकूब अगले महीने से अब आपके घर - २ घूमते मिलेंगे. तो कही न कही इस बयान से इतना साफ ज़ाहिर हो जाता है कि अजित सिंह भी मुस्लिम - किसान गठबंधन की राजनीति कों भुनाना चाहते है जिसका फायदा उन्हें इस विधानसभा चुनाव में मिले. लेकिन ये तो आने वाला वक्त ही तय करेगा की याकूब अपनी राजनीतिक प्यास कों नल के पानी से बुझाएंगे की नहीं .....

{ लेखक : ललित कुमार कुचालिया (प्रसारण पत्रकारिता)
( माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविधालीय भोपाल, म. प्र. ). और हाल ही में महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालीय वर्धा, ( महाराष्ट) से एम्. फिल. ( जनसंचार ) का शोधार्थी है " "हरीभूमि" ( दैनिक समाचार) छत्तीसगढ़ में रिपोर्टर भी रहे. देहरादून --- "वोइस ऑफ़ नेशन" न्यूज़ चैनल में भी काम किया ....}

03/10/2011

पुरानी दुश्मनी का बदला...........


उत्तर प्रदेश में पार्टी से नेताओ का निकाले जाने का सिलसिला लगातार बना हुआ है..... आये दिन कोई न कोई नेता बीएसपी पार्टी से निलंबित किया जा रहा है..... कोई हत्या के प्रकरण में शामिल है, तो कोई विवादों कों लेकर अपनी लोकप्रियता बटौर रहा है.... लेकिन इस बार मामला है उ. प्र. के मेरठ से है . जहा बसपा से विधायक हाजी याकूब कुरैशी कों पार्टी से निष्कासित कर दिया गया,इस विधायक का कसूर इतना है कि उसने घोसीपुर में अस्थाई कमेले की नीव रखने के मौके पर सिखों के ऊपर बेहूदी टिप्पणी की ...... "याकूब ने सिखों की तुलना कमेले में काटने वाली भेसों से की" . इस भाषण से सिख समुदाय में इस समय ज़बरदस्त आक्रोश बना हुआ है ... याकूब इससे पहले भी विवादों के घेरे में कई बार आ चुके है.. चाहे डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का सर कलम करने की बात हो, या फिर सिपाही कों थप्पड़ मारने का प्रकरण हो, लेकिन इस बार याकूब के लिए यह टिप्पणी भारी पड़ गई.... इसी के चलते सीएम् मायावती ने हाजी कों पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया ..... यह जानकारी प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसद मोर्य की ओर दी गई, ओर कहा की याकूब पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में अब भाग नहीं लेंगे...

वैसे भी पैसे वालो नेताओ के लिए ये चीजे कोई मायने नहीं रखती, ये चिकनी मिटटी के घड़े की तरह होते है, जब चाहे कही भी फिसल जाते है ........ . पैसे के बल पर किसी भी पार्टी से जाकर जुड़ा जाते है.... लेकिन अब सवाल ये खड़ा होता है की जिस जनता के सहारे ये कुर्सी पर बैठते है... कही न कही जनता कों भी अपने चुने हुए प्रतिनिधि से कुछ न कुछ उम्मीद तो रहती ही है कि ये हमारे क्षेत्रो में अच्छा विकास हो .. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता ... वो इसलिए जिन मुद्दों कों लेकर प्रत्याशी मैदान में उतरते है ..... यह केवल चुनाव तक ही सीमित होते है... जीतने के बाद सब गोल माल हो जाते है ..... इसमें कही न कही हमारे मतदाताओ की भी सबसे बड़ी कमी ये होती है कि उसे वोट डालने से पहले ये देख लेना चाहिए कि प्रत्याशी का कोई अपना व्यक्तित्व है भी की नहीं, क्या ऐसे ही जब मुह उठाये वोट देने चले गए ...... लेकिन हमारा मतदाता जानते हुए भी न जाने क्यों अनजान बन जाता है..... खासकर जिस दिन मतदान होता है........... ओर उसी का खामियाजा फिर पांच साल तक भुगतना पड़ता है .....

कुरैशी कों हाल में मेरठ शहर से दक्षिणी सीट पर प्रत्याशी बनाया था ... याकूब मुस्लिम समुदाय की कसाई बिरादरी से ताल्लुक रखते है, मूलरूप से ये बरादरी भेंसो का व्यापार करती है .. कुरैशी भी भेंसो के मीट के बहुत बड़े व्यापारी है. जिनका मीट देश- विदेशो में सप्लाई होता है... अब आप ही अंदाज़ा लगा सकते है कितना बड़ी हेसियत है इस इन्सान की .....शहर के बीचो - बीच कुरैशी के कई कमेले है जिनको लेकर हमेशा से विवाद होता रहता है... इस कमेले से निकलने वाला गन्दा पानी, बुरी बदबू वातावरण कों तो दूषित करता ही है.. और साथ ही साथ यहा से गुजरने वाले हर इन्सान का निकलना भी मुहाल हो जाता है .... कई बार मेरा भी इसी इलाके से गुजरना हुआ, लेकिन मुझसे भी नहीं रहा गया.. इस कमेले से सटी हुई शास्त्रीनगर कालोनी भी इसकी चपेट में है...स्थानीय लोगो दुवारा की गई शिकायत का असर शासन प्रशासन पर कोई मायने नहीं रखती क्योकि सारा मामला केवल राजनीति तक ही सिमट कर रह जाता है ....मामले की सुलह बीच में ही कर ली जाती है, अब आप ही सोचिए की पैसे ओर राजनितिक पावर के दम पर कैसे हर चीज़ घुटने टेक देती है, तो फिर कहा से आम जनता की समस्या का समाधान हो पायेगा ? बड़ा ही मुश्किल सवाल है जो मेरे जेहन में उठता रहता है, तो क्या ऐसे नेताओ से हम विकास की उम्मीदकर सकते है ?
वर्ष २००४ के लोकसभा चुनाव में मेरठ लोकसभा सीट से कुरैशी समुदाय के शाहिद अख़लाक़ कों बसपा से सांसद बनाया गया. जनता कों इनसे भी बहुत- सी उम्मीदे थी, लेकिन इनकी उम्मीदे भी जनता के लिए नागवार गुजरी, ज़रा याद कीजिए उस दौर कों जब उ० प्र० में वर्ष २००४ लोकसभा चुनाव के बाद नगर निकाय चुनाव हुए थे, उस समय सभी दलों ने अपने - अपने प्रत्याशियों कों चुनाव चिन्ह दिया था, लेकिन बसपा ने ऐसा नहीं किया, उसमें शाहिद अखलाख की पत्नि भी मेयर चुनाव के लिए मैदान में थी, बिना चुनाव चिन्ह के लिए सभी प्रत्याशियों कों काफी मशक्कत करनी पड़ी थी, जिसका फायदा भाजपा कों मिला ओर मेरठ से भाजपा की मेयर मुधू गुर्जर चुन ली गई... बस तब से ही शाहिद ने बसपा से कन्नी कटनी शुरू कर दी थी, ओर अपनी नई पार्टी के साथ सपा में जा शामिल हुए, काफी लम्बे समय से कुरैशी नेता मेरठ की राजनीति में अपनी साख बनाए हुए है, जनसंख्या में मामले में इनकी तादात न के बराबर है, मात्र पैसे के बल पर ये लोग राजनीति में है, न ही ज्यादा शिक्षित है ओर न ही राजनीति के मायने का पता, तो ऐसे नेताओ से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

वर्ष २००७ की विधानसभा चुनाव में कभी बसपा के हमदम रहे याकूब ने अपनी एक नई पार्टी यूडीएफ के बदौलत मेरठ शहर से चुनाव लड़ा ओर भारी मतों से जीत भी गए , लेकिन उनके समर्थको ने जीत की ख़ुशी का इज़हार इस तरह से किया कि मानो दिवाली का त्यौहार मनाया जा रहा हो , खुले आम सडको पर हथियार लहराकर असमान में गोलिया दागी जा रही थी, कुछ समय के लिए तो पूरा शहर सहम - सा गया कि ये हो क्या रहा है ? यूडीएफ से विधायक बनने के बाद याकूब बसपा में ही शामिल हो गए , क्योंकि पार्टी पूर्ण बहुमत से जो जीती थी, सोचा था की पार्टी में कुछ तो कद बढेगा लेकिन मायावती ने याकूब कों पार्टी में कोई अहमियत नहीं दी, साल २००२ में जब बसपा की गठबंधन की सरकार बनी थी,तो कुरैशी खरखौदा विधानसभा सीट से जीते ,२००४ में जब बसपा सरकार बीच में ही किन्ही कारणों से गिरा दी गई थी, तो याकूब बसपा के २३ विधायको कों तोड़कर सपा पार्टी में जा शामिल हुए थे, मोटी रकम के बल पर विधायको की खरीद फरोख्त याकूब ने ही की थी, बस तभी से याकूब मायावती की आँखों में खटके हुए थे, आखिर कभी न कभी तो पुरानी दुश्मनी का बदला तो लेना था तो इससे अच्छा मौका ओर हो भी क्या सकता था,

२००४ में जब सपा की सरकार आई, तो हाजी याकूब कों अल्पसंख्यक राज्य मंत्री का भी दर्जा दिया गया, लेकिन उन्हें यह भी पार्टी रास नहीं आई ओर अंत में इससे भी रुखसत कर दिए गए, सवाल अब यह है कि आखिर अब वे किस पार्टी की ओर रुख तय करेंगे ? मामला बड़ा ही दिलचश्प है, याकूब ने अपना राजनीतिक सफ़र, अपने ताऊ कांग्रेसी नेता हकीमुद्दीन से प्रेरित होकर की, जो एक प्रभावशाली नेता होने के नाते शहर से कांग्रेस अध्यक्ष भी थे, तो क्या याकूब फिर से पुराने खेमे में जायेंगे या अपनी नवगठित पार्टी यूडीएफ कों पुनर्जीवित करेंगे? वैसे न्योता मिलने पर याकूब आरएलडी से भी हाथ मिला सकते है, मौका परस्ती लोग अच्छा मौका कभी नहीं गवाते है

अगला याकूब कौन होगा ? इसका डर हर किसी कों सता रहा है, कभी समाजवादी पार्टी के सिपसलाहकार रहे अमित अग्रवाल कों मायावती ने मेरठ केंट से प्रत्याशी घोषित किया था,ओर अंत में उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, हस्तिनापुएर सीट से विधायक योगेश वर्मा का भी इस बार टिकिट काट दिया, उनकी जगह अब प्रशांत गौतम कों इस बार हस्तिनापुर सीट से नया प्रत्याशी बनाया है, सरधना विधानसभा सीट से चंद्र्बीर सिंह पर भी तलवार लटकती दिख रही है, क्योंकि उनके भाई पर हत्या का आरोप जो लगा है , किठौर विधानसभा सीट से नये प्रत्याशी ओर खरखौदा विधानसभा सीट से विधायक लखीराम नागर पर हालाकि कोई आरोप नहीं है, इसीलिए उनकी जगह अभी सुरक्षित है, सिवालखास के विधायक विनोद हरित कों अभी कही से प्रत्याशी नहीं बनाया है, कुल मिलाकर ये कहा जा सकता की है , कि माया का अगला निशाना कौन होगा ?

08/09/2011

फिल्म निर्देशक कम और थियेटर निर्देशक ज्यादा,


महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविधालीय वर्धा में त्रिदिवसीय महात्मा गाँधी अंतरराष्ट्रीय फिल्म समारोह का उद्घाटन सुप्रसिद्ध फिल्मकार "गाँधी माई फादर" के निर्देशक फ़िरोज़ अब्बास खान ने किया और उनकी फिल्म का प्रदर्शन भी हुआ. उद्घाटन समारोह कि अध्यक्षता विश्वविधालीय के कुलपति विभूति नारायण राय ने की.

फिल्म फेस्टिवल में तीन दिनों तक ओमपुरी, फ़िरोज़ अब्बास खान, सीमा कपूर, अनवर ज़माल, अमित राय, रणजीत कपूर, एल. एडविन, गौतम घोष, संजय झा, की रोड टू मेप, इस्ट टू इस्ट, स्वराज, जब दिन चले न रात चले, स्ट्रिंग्स, ब्राउंड बाई फेथ, सहित कई अन्य फिल्मो का प्रदर्शन हुआ. इस कार्यक्रम के मुख्य अथिति फिल्म अभिनेता ओमपुरी रहे, जिन्होंने इस फिल्मोत्सव का समापन किया.

इस मौके पर सुप्रसिद्ध फ़िल्मकार और थियेटर निर्देशक फ़िरोज़ अब्बास खान की एम. फिल.( जनसंचार) के छात्र ललित कुमार और हर्षवर्धन पांडे से विशेष बातचीत.

प्रश्न.1 : इस फिल्म कों बनने के लिए आपके मन में विचार कहा से आया ?

उत्तर: मै काफी लम्बे अरसे से थियेटर से जुड़ा हुआ हू. और अभी भी जुड़ा हू . इस फिल्म कों बनाने मै मुझे कुछ लोगो ने कहा कि एक फिल्म ऐसी बनाओ, जो थियेटर से एकदम हटकर हो. मैंने इस फिल्म कों थियेटर से दूर रखा है. नये तरीके से इस पर रिसर्च किया और नई सोच के साथ मैंने इस पर काम किया.

प्रश्न. 2 : फिल्म कों बनने के लिए आपको किन- किन दिक्कतों का सामना करना पड़ा ?

उत्तर : मैंने इस फिल्म कों लेकर काफी रिसर्च किया. फिल्म बनाने से पहले हमने देखा की हमसे कोई गलती तो नहीं हुई, गाँधी जी की कहानी कों लेकर जो काम किया उसमे सबसे ज़रूरी था कि जिस व्यक्तित्व कों हम महात्मा कह रहे है. आखिर क्यों कह रहे है ? उसके पीछे क्या कारण है ? एक ऐसा आदमी जिसके पीछे सारा देश खड़ा है या फिर जिसकी एक आवाज़ पर सारा समाज खड़ा हो जाए, मुझे लगता है वही महात्मा है, रिसर्च के लिए में कई बार साउथ अफ्रीका भी गया, जहा मै कई लोगो से मिला जो गाँधी जी कों ही बड़े करीब से जानते थे. वहा के कुछ इतिहासकारों से बातचीत की,. जिसके लिए मुझे थोड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ा.

प्रश्न.3: आपके क्या -क्या स्रोत रहे है इस फिल्म के लिए ?

उत्तर : मेरे सबसे बड़े स्रोत चंदीलाल दलाल जो गाँधी जी के लेखाकार थे उनकी किताबो कों पढ़ा, लीलम बंसाली, हेमंत कुलकर्णी की अनमोल विरासत जैसी की किताबो कों भी पढ़ा और महाराष्ट्र के बहुत बड़े इतिहासकार अज़ीज़ फडके से में समय - समय पर बात करता था, रोबेर्ट सेन की बायोग्राफी कों लिया ये मेरे स्रोत रहे है इस फिल्म के लिए .

प्रश्न. 4 : फिल्म के किरदारों कों लेकर आपकी क्या राय है ?

उत्तर : जैसा मुझे लगता है गाँधी के बेटे का रोल अक्षय खन्ना ने जो किया है उनकी अपनी ज़िन्दगी का अब तक का सबसे बेहतरीन किरदार था , महात्मा गाँधी का रोल "दर्शन जरीवाला" ने भी अच्छे से किया, और शेफाली शाह ( कस्तूरबा बाई ) कों इस रोल के लिए कई बार इंटरनेश्नल फिल्म फेस्टिवल अवार्ड भी मिला है. कुल मिलाकर सभी लोगो ने अच्छा काम किया. इस फिल्म को कई बार नेशनल अवार्ड मिले और इंटरनेश्नल अवार्ड भी मिला, हॉवर्ड विश्विधालीय ने भी इस फिल्म कों अवार्ड दिया.

प्रश्न. 5 : वैश्वीकरण के इस दौर में इस फिल्म कों लेकर दर्शको से आप क्या अपेक्षा करते है ?

उत्तर : आज के दौर में दर्शको से में क्या उम्मीद करू? वही तय करते है कौनसी फिल्म अच्छी है और कौनसी अच्छी नहीं है ये तो उनके ऊपर है. वो किस तरह की फिल्मे देखना चाहते है.. देखिए जैसा कहा जाता है की "लाइफ ब्लो द बेल्ट, बेल्ट इज ब्लो " ये तो आपको तय करना है कि आप जीवन में ब्लो द बेल्ट जाना चाहता है. इस फिल्म कों बनाने की लिए मैंने पांच साल तक रिसर्च किया.मेरे लिए ये अपने आप में एक बड़ी बात है.

प्रश्न. 6 : आज के दौर की फिल्मो में जो अशिष्ट भाषा शैली का उपयोग किया जाता है जैसे "देहली बेली " आपका क्या मानना है ?

उत्तर: - मेरा मानना है कि थोडा बहुत तो चल जाता है. अगर आप ज्यादा अशिष्ट भाषा शैली का उपयोग करते है तो उस तरह की फिल्मो कों आप अपने परिवार के साथ बैठकर नहीं देख सकते. आज के लोगो में फिल्म देखने का नज़रिया बिलकुल ही बदल गया है. जिसके चलते निर्देशक भी ये तय करने लगे है की आपको क्या चाहिय?

प्रश्न. 7 : थियेटर के बारे में आप क्या कहना चाहेगे ?

उत्तर : देखिए मैंने आपको पहले भी बताया की मै फिल्म निर्देशक कम और थियेटर निर्देशक ज्यादा, बालीवुड में आज जितने भी थियेटर के कलाकार काम कर रहे है. मुझे नही लगता आज भी कोई उनसे अच्छी कलाकारी में निपुण हो.थियेटर में एक खास बात यह होती है कि इसमें दर्शक आपके प्ले कों तुरंत फीडबेक देता है. जबकि फिल्म में ऐसा नहीं है .

प्रश्न. 8 : हबीब तनवीर जी के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे ?

उत्तर : तनवीर साहब से मेरे काफी अच्छे संबध रहे है. आखरी बार जब वे एनएसडी आए तो उन्हें पता चला फ़िरोज़ का प्ले है . तो उन्होंने वो मेरा प्ले देखा मैंने उस प्ले मैंने रामलाल का रोल किया था, उन्होंने मेरी काफी तारीफ भी की थी. मै समझता हू कि तनवीर साहब की तुलना में अब तक न तो कोई थियेटरकार था और न होगा. वो अलग मिजाज़ के थियेटरकार थे.

05/09/2011

रामलीला मैदान में भ्रस्टाचारी रावण का अंत




जिस लोकतंत्र के सहारे देश चलता है. उसे देश कों कुछ चुनिन्दा लोग ही चलाते है. जिनको जनता संसद तक पहुचाए और संसद में बैठने वाले ये सांसद, अगर देश की जनता के साथ गद्दारी करे, तो जनता कों मजबूरन सडको पर उतरना ही पड़ेगा. आखिर हुआ भी वही जो देश की जनता चाहती थी. देश भ्रस्टाचारी तंत्र के चलते अंदर से खोखला होता चला जा रहा है, किसी कों भी इसकी चिंता नहीं है. भ्रस्टाचारी सरकार का सामना किया भी ऐसे 74 साल के वृद्ध ने जो सीधे सरकार की छाती पर जा बैठा और कहने लगा, अब बहुत हो चुका, अब और नहीं होने दूंगा. सरकार ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा. कि महाराष्ट के रालेगण सिद्धि से चलकर कोई हमको टक्कर देगा .

गाँधीवादी अन्ना ने जब दिल्ली के रामलीला मैदान से एक नौजवान युवक कि तरह इन्कलाब जिंदाबाद और वन्दे मातरम, जैसे नारे लगाने शुरू किये तो मानो समूचा देश एक ही राह पर चल पड़ा और कहने लगा "में भी अन्ना तू अन्ना " अनशन के दौरान अन्ना जिस भी रूप दिखे , उस रूप के भी कई मायने हो सकता है. अन्ना कृष्ण रूप में भी हो सकते है क्योंकि जन्माष्ठमी भी अन्ना ने यही से मनाई , अन्ना राम रूप में भी हो सकते है. जिन्होंने भ्रस्टाचारी रूपी रावण का वध इसी रामलीला मैदान में किया. 288 घंटो का अनशन खत्म करने के बाद जब अन्ना अपने गाँव वापस पहुचे तो उनका स्वागत भी उसी अंदाज़ में हुआ. जैसे श्री रामजी का अयोध्या की वापसी पर हुआ था.

इस रामलीला मैदान के भी अपने कई मायने है ज़रा इन्हें भी समझ लेते है. इसी रामलीला मैदान से कई राजनितिक दलों ने रैलिया भी की थी. पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना ने 1945 में मुस्लिम लीग की रैली भी यही से हुई. 1965 में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बाहदुर शास्त्री ने भी इसी मैदान से "जय जवान जय किसान" का नारा लगाया था. इंदरा गाँधी ने भी इसी मैदान से भारत की पाक. पर जीत के लिए रैली यही से की थी. 1975 में जे. पी.ने भी " सिंघासन खाली करो कि जनता आ गयी है " का नारा भी यही से लगाया था. उस वक्त भी जे. पी. के साथ जनता का पूरा जनसमर्थन था, 1777 में कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में शामिल हुए बाबू जगजीवन राम ने इसी मैदान से रैली की थी. 1990 में भी रामजन्म भूमि की गूंज के लिए भी यही से रैली हुई थी.

लेकिन 2011 में रामलीला मैदान के मायने ही बदल गए. इस बार रामलीला मैदान में पहली बार किसी गैर राजनितिक दल ने लोगो का ऐसा जनसैलाब इकठठा किया की मानो अब तक के सारे रिकॉर्ड ही धुवस्त हो गये. लेकिन जिस अन्ना के आसरे दिल्ली की सडको पर लोगो का जनसैलाब उमड़ा. उससे मतलब अब साफ हो चला है की देश की जनता अब चुप नहीं बैठने वाली है. आखिर इन सबके बीच दिल्ली का जे.पी. पार्क अन्ना के लिए ऐतिहासिक तो बन नहीं सका लेकिन रामलीला मैदान का नाम एक बार फिर से इतिहास के पन्नो में फिर से दर्ज हो गया .

रामलीला मैदान में अब तक जितनी भी रैलिया हुई वो सारी राजनितिक रैलिया थी. लेकिन इन सबके बीच किसी गैर राजनितिक दल ने देश की सरकार कों झुकने के लिए मजबूर कर दिया. और सरकार कों बता दिया की अन्ना के क्या मायने होते है ? जिस अन्ना के आसरे लोगो का जनसैलाब सडको पर उमड़ा, उन्होंने देश की सरकार के भीतर घुसे भ्रस्टाचारी रूपी रावण कों खत्म करनी की ठानी. एक ओर अन्ना का यह भी कहना है की यह तो अभी आधी जीत हुई है. कही न कही अन्ना का ये आन्दोलन आगे भी जारी रहेगा, इससे लगता कि अन्ना अब किसी से नहीं रुकने वाले नहीं है. जिस अहिंसावादी तरीके से यह आन्दोलन हुआ जिसको विदेशी मीडिया में भी तवज्जो मिली वो भी अपने आप में काबिले तारीफ है.

सवाल एक अन्ना का नहीं है सवाल है समूचे देश का जो भ्रस्ताचार की आग में झुलस रहा है.ऐसे में अगर एक अन्ना आगे आकर देश का प्रनिधित्तिव करे तो क्या बुराई है ? कहते है देश कों चलाने के लिए संसद के भीतर नई - नई परिभाषाए गढ़ी जाती है, लेकिन रामलीला मैदान में अन्ना ने देश कों चलाने के लिए, एक नई परिभाषा कों जन्म दिया. और बता दिया की देश अब आपकी परिभाषा से चलने वाला है. जो जनता तय करेगी वही अब आपको करना पड़ेगा. क्योकि संसद से बड़ी जनसंसद है.

रामलीला मैदान में जैसा इस बार हुआ देश के इतिहास में अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ, राम रूपी अन्ना ने भारत सरकार के भीतर छुपे रावण का अंत तो कर दिया लेकिन लोगो के मन में अभी भी यही सवाल बना हुआ है कि देश में भ्रस्टाचार खत्म होगा कि नहीं
"इसलिए कहा जाता है की बुराई पर अच्छाई की जीत."

19/08/2011

तहरीर चौक न बन जाये कही इंडिया.................




तहरीर चौक का नाम सुनते ही हमारे ही मन में एकदम मिस्र की क्रांति की याद ताज़ा होने लगती है.. मिस्र में जो भी हुआ वह भी काफी हद तक अपने आप में सही था क्योंकि मिस्र की जनता हुस्नी मुबारक की तानाशाही से उब चुकी थी...देश का एक ऐसा वर्ग हुस्नी मुबारक कों कड़ा जवाब देने के लिए एकदम तैयार था.... जब उनकी तानाशाही अपने उच्च शिखर पर पहुची ..तो काहिरा वो तहरीर चौक देशवासियों के लिए कही न कही उम्मीद की नई किरणों के साथ देहलीज की चोखट पर खड़ा था...... देश की जनता कों ज़रूरत थी एक आजद मिस्र की जो हुस्नी मुबारक के हाथो की कठपुतली बन चुका था .......देश जब लोकतंत्र की मांग कर पर अडिग था, तो उधर हुस्नी कों अपनी तानाशाही का गरूर हो रहा था ....इन सब के बीच मिस्र कों अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी समर्थन मिल रहा था ...कुछ इस्लामी देश इसका विरोध भी कर रहे थे ...माना ये भी जा रहा था कि कही मिस्र कों अमेरिका तो समर्थन नहीं कर रहा, मिस्र की सबसे बड़ी "मुस्लिम बद्र्हूद पार्टी" अमेरिका का विरोध कर रही थी .....


मिस्र की जनता जब सडको पर अपनी मांगो कों लेकर आई, तो हुस्नी कों लगने लगा था कि जनता कों संभाल पाना मुश्किल है ...क्योकि जनता तानाशाही कों खत्म करके देश में लोकतंत्र चाहती थी .....जहा सभी लोगो कों अपना हक़ मिल सके और अपनी बातो कों सही से सबके सामने रख सके..... ताकि उनकी बातो कों दबाया या फिर कुचला न जा सके.......कही न कही एक सही लोकतंत्र की यही पहचान होती है ..... वहा की जनता सही मायने में यही चाहती थी... मिस्र की जनता जब तानाशाही सरकार के खिलाफ सडको पर उतरी... तो हिंसात्मक आन्दोलन के चलते बहुत से लोगो कों शहीद होना पड़ा ......अंत में मिस्र में लोकतान्त्रिक राज आया और तानाशाही सरकार कों झुकना पड़ा .......... सही मायने में देश कों बदलाव चाहिए था जिसको उस लम्बे समय से इंतज़ार था मिस्र की इसी क्रांति के साथ काहिरा का वो तहरीर चौक देश के इतिहास के पन्नो में दर्ज हो गया .........
आज भारत मै इस समय जो हालात बने हुए है वो मिस्र कि परिस्थिति से एकदम उल्टा है....भारत जैसे लोकतान्त्रिक देश में सिर्फ उन नेताओ कि तानाशाही है .....या फिर यू कहे उन भ्रष्ट मंत्रियो, अधिकारियो की जो सरकार के नाम पर गलत ढंग से उगाही करते है .......सरकार जो भी काम करना चाहती है उनके मंत्री या फिर उनके दलाल उस काम कों सही से होने ही नहीं देते...... उन्हें सिर्फ अपनी जेब भरने से काम है .... मतलब साफ है कि " अपना काम बनता, भाड़ में जाये जनता " ... आज देश की कमर भ्रष्टाचार ने पूरी तरह से तोड़ दी है देश का कोई भी ऐसा कोना नहीं बचा है जहा भ्रष्टाचार न फेला हो........... जनता इन भ्रष्ट नेताओ से पूरी तरह से त्रस्त आ चुकी है ... इनके सभी वायदे खोखले साबित दिखाई पड़ते है ..जनता का विश्वास इनसे उठ चुका है ... ये समझकर इनको सांसद में भेजते है, ताकि हम लोगो का प्रतिनिधित्व करेगे लेकिन होता है एकदम उल्टा ......जब यही मंत्री जनता कि उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाते तो जनता कों मज़बूरी में सडको पर उतरना पड़ता है ..... अगर जनता इनके खिलाफ विरोध प्रदर्शन या फिर जन आन्दोलन करे है तो उसमे क्या गलत करती है ?........

आज देश कों ज़रूरत है भ्रष्टाचारी सरकार कों जड़ से उखाड़ फेकने की देश में आज भ्रष्टाचार विधेयक यानी जन लोकपाल विधेयक कों लेकर सरकार और आमजन के बीच तलवारे खीची हुई है .... देश के कुछ चुनिन्दा लोग आगे आकर इसकी पेरवी कर रहे है जैसे अन्ना हजारे की टीम .......अन्ना की यही टीम सरकार कों एक बार पहले भी झुका चुकी है ......लेकिन इस बार के आन्दोलन से लगता है....कि अन्ना की अगस्त क्रांति एक फिर से देशवासियों कों मिस्र कि क्रांति कि याद दिला दे रही है ... दिल्ली की तिहाड़ जेल से लेकर इंडिया गेट या फिर जहा तक भी नज़र जाये वही तक अन्ना के ही समर्थको का ही सेलाब दिखाई दे रहा है और नारा लगा रहे है ...मै भी अन्ना तू भी अन्ना, अन्ना तुम संघर्ष करो, हम तुम्हारे साथ है, अन्ना से जो टकराएगा, वो चूर-चूर हो जायेगा .... इस तरह के नारे दिल्ली की सडको पर चारो और सुनाई दे रहे है ....जिससे ये साफ दिखता है कि भ्रष्टाचार कों देश से खत्म करना है ........... इस भ्रष्टाचार के मायने और भी हो सकते है... जिस भ्रष्टाचार कों हम अन्ना के जनलोकपाल बिल के माध्यम से ख़त्म कराने के लिए इतना सब कुछ कर रहे है.... क्या ये जनलोकपाल बिल के मध्यम से खत्म हो जायेगा .. ये सबसे बड़ा सवाल लोगो के बीच बना हुआ है .....अन्ना हजारे जनलोकपाल के माध्यम से प्रधानमंत्री और सुप्रीम कोर्ट के जजों कों इसके दायरे में लाना चाहते है ....जो सरकारी लोकपाल बिल से एकदम अलग है..... सरकार के लिए ये विधेयक पास न करना गले कि हड्डी बना हुआ है ..........

केंद्र सरकार कि यही तानाशाही अन्ना कि टीम कों रास नहीं आ रही है...... जिसके समर्थन में आज सेकड़ो की तादात में ये लोग अन्ना कों समर्थन करने के लिए उतर पड़े है ......अन्ना ने सरकार कों पहले ही चेता दिया था कि वो 16 अगस्त से अनशन करने वाले है ... जिसको लेकर सरकार की चिंताए लगातार बढती चली जा रही थी ....... जब अन्ना अपना अनशन करने के लिए जैसे ही जेपी पार्क के लिए निकले तो उनको दिल्ली पुलिस ने गिरफ्तार भी किया ........ पुलिस कारण तो नहीं बता पाई की उनको क्यों गिरफ्तार किया ....सीधे उन्हें तिहाड़ जेल में बंद कर दिया......तभी अन्ना के समर्थको का हुजूम सडको पर उतरकर भ्रष्टाचार में लिप्त सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन के खिलाफ नारे लगाने लगा .......... जिससे केंद्र सरकार का सिंघासन डोलने लगा ........अन्ना की यह अगस्त क्रांति मिस्र की क्रांति से कही न कही मिलती जुलती है ........... दिल्ली की सडको पर सेकड़ो लोग सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते दिखाई पड़ रहे है ....... अन्ना की इस आंधी के सामने केंद्र सरकार झुकती नज़र आ रही है .... ठीक हुस्नी मुबारक की तरह ........... देशवासियों कों पूरा विश्वास है हमें कामयाबी ज़रूर मिलेगी ......

" स्याल भेडियो से डर सकती
सिंघो कों संतान नहीं
भरतवंश के इस पानी
है, तुमको कों पहचान नहीं "
और याद रखना
" अबकी जंग छिड़ी तो, सुन लो
नाम निशान नहीं होगा,
सरकारे तो होगी, पर भ्रष्टाचार नहीं होगा "

05/07/2011

ये लडकिया .................

लड़कियों के डर भी अजीब होते हैं
भीड़ में हों तो लोगों का डर
अकेले में हों तो सुनसान राहों का डर
गर्मी में हों तो पसीने से भीगने का डर
हवा चले तो दुपट्टे के उड़ने का डर
कोई न देखे तो अपने चेहरे से डर
कोई देखे तो देखने वाले की आँखों से डर
बचपन हो तो माता-पिता का डर
किशोर हो तो भाइयों का डर
यौवन आये तो दुनिया वालो का डर
राह में कड़ी धुप हो तो,चेहरे के मुरझाने का डर
बारिश आ जाये तो उसमें भीग जाने का डर
वो डरती हैं और तब तक डरती हैं
जब तक उन्हें कोई जीवन साथी नहीं मिल जाता
और वही वो व्यक्ति होता हैं जिसे वो सबसे ज्यादा डराती है ....

22/05/2011

मैं उजला ललित उजाला हूँ!

मैं उजला ललित उजाला हूँ!

मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है!

तेरे मन के तम से लड़ता हूँ
तेरी राहें उजागर करता हूँ
आओ मुझे बाहों में भर लो!
मुझ सा कोई प्यार नहीं है

मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है!

तेरे रोम-रोम में भर जाता हूँ
तेरे दर्द को मैं सहलाता हूँ
आओ मुझे देह में भर लो!
मुझ सा कोई उपचार नहीं है

मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है!

यूं तो नहीं मेरा कोई भी रूप
हूँ मैं ही चांदनी, मैं ही धूप
आओ मुझे अंजुली में भर लो!
मुझ में कोई भार नहीं है

मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है!

क्यों मन में भय को भरते हो
क्यों अंधियारे से डरते हो
आओ मुझे अंखियों में भर लो
मुझ सा कोई दीदार नहीं है

मैं हूँ तो फिर अंधकार नहीं है!
मैं उजला ललित उजाला हूँ!

ललित कुमार दुवारा


09/05/2011

माँ....... तेरी ऊँगली पकड़ कर चला ....



माँ.. तेरी ऊँगली पकड़ कर चला

ममता के आँचल में पला .....


हँसने से रोने तक तेरे ही पीछे चला

बचपन में माँ जब भी मुझे डाटती.....


में सिसक -२ कर घर के किसी कोने में जाकर रोने लगता

फिर बड़े ही प्रेम से मुझे बुलाती ॥


कहती, बेटा में तेरे ही फायदे के लिए तुझे डाटती

फिर में थोडा सहम जाता और सोचता...


माँ, मेरे ही फायदे के लिए मुझे डाटती

जब भी में कोई काम उनके अनुरूप करता ...


तो मुझे फिर से डाट देती ....

आज भी माँ कि डाटती खाने का बड़ा ही मन करता ---


माँ कि डाट, मुझे हर बार नई सीख देती ....


आज भी जो लोग माता पिता का चरण स्पर्श कर आशीर्वाद ले, दिन कि शरूवात करते है. वे मानते है कि अगर माँ का आशीर्वाद मिल गया तो आस [पास कोई संकट नहीं फाटक सकता, कोई कुछ बिगाड नहीं सकता ....

ललित कुमार कुचालिया..... (देहरादून )

06/05/2011

क्लिक ...क्लिक ...क्लिक....

इस मासूम कों आखिर क्या बीमारी लगी है ................ ऐसा ही एक मामला कानपुर के अस्पताल में देखने कों मिला है.........





















21/02/2011

योजनाओ का सहारा ..................



योजनाओ का सहारा आगामी विधान सभा चुनावी सरगमी उत्तराखंड राज्य अपने पैर पसारती जा रही है . जैसे -२ चुनाव नजदीक आते जा रहे है ....वैसे -२ निशंक के चेहरे की भाव भंगिमाए दिनों दिन बढती जा रही है ...वोट पाने के लिए प्रदेश सरकार योजनाओ का सहारा ले रही है ...डा. निशंक नितीश और मोदी की रहा पर चलना चाह रहे है ..निशंक की तुलना अगर नितीश और मोदी से कर भी दी जाये ..... तो शायद हसी के पात्र भी बन सकते है... निशंक सरकार कों इन दोनों की राह पर चलने की लिए ,बहुत कुछ सीखना पड़ेगा तभी जाकर इनकी बराबरी कर पायेगे ....आगामी विधान सभा चुनावो की रणनीति कों लेकर सभी राजनीति दलों अपनी - २ गोटी फेलानी शुरू कर दी है...जहा एक और उत्तराखंड ने अपनी स्थापना का एक दशक पूरा किया ..वही दूसरी और राज्य अपने विकास के रोने रो रहा है ...उत्तराखंड ने अब तक प्रदेश कों पांच मुख्यमंत्री दिए ... लेकिन किसी ने अब तक इसके विकास के बारे में नहीं सोचा ....
राजधानी देहरादून में राष्टीय पत्रकार संघ उत्तराखंड जिला इकाई का आयोजन किया गया ...जिसके मुख्य अथिति गढ़वाल सांसद सतपाल महाराज रहे ..कार्यक्रम की अध्यक्षता मदन कोशिक (पर्यटन मंत्री) ने की ....इस कार्यक्रम का मकसद मीडिया के लिए नए-२ आयाम देना और पत्रकार बंधुओ के लिए विषम परिथितियो में प्रदेश सरकार सुविधाये मुहिया कराना ... आगामी ,चुनाव के मद्देनज़र मुख्यमंत्री घोषणाओ पर घोषनाए लगातार करते जा रहे है ...हाल ही में प्रदेश सरकार पत्रकारों की लिए आवासीय कालोनी और पत्रकार कल्याण कोष के लिए अब तक पाच करोड़ रूपये की घोषणा कर चुकी है ......प्रदेश सरकार के लिए ये अपने आप में एक अनूठी पहल भी कही जा सकती है
करीब डेढ़ माह पहले देहरादून में A 2 Z टीवी चेंनल. के एक पत्रकार की दुर्घटना में हुई मोत से राज्य के सभी पत्रकारों ने इस पर शोक व्यक्त किया लेकिन मुख्यमंत्री ने पत्रकार की मोत के प्रति कोई शोक सवेदना व्यक्त नहीं की.... मुख्यमंत्री के पास इतना समय ही नहीं है की वे किसी के लिए थोडा समय निकाल सके......... मुख्यमंत्री निशंक चुनावो की रणनीति के खाका बनाने में व्यस्त है....... राष्टीय पत्रकार संघ ने अपने स्तर इस पर कार्यवाई की तो निशंक ने पत्रकार संघ के दबाव के चलते मृतक पत्रकार कों दो लाख का चेक देने की घोषणा की ..
11 फरवरी 2011 कों देहरादून के गाँधी पार्क में मुख्यमंत्री ने अटल खाद्दान योजना का उद्घाटन किया...हजारो की तादाद में लोगो ने इस समारोह में शिरकत ली ...मुख्यमंत्री ने स्वम इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भी की ....इस आयोजन के माध्यम के मुख्यमंत्री ने अनेको योजनाये जनता के समक्ष रखी जिसमे आईएएस अकादमी, आईआईटी, आईआईएम्.. देशी विदेशी छात्रो कों स्कोलरशिप देना, उत्तराखंड में गरीब परिवारों के बच्चो कों फ्री शिक्षा देना, कूड़ा बीनने वालो बच्चो कों मुफ्त शिक्षा देना, एमबीबीएस की पढाई मात्र पन्द्रह हज़ार रूपये में और बीपीएल परिवारों के बच्चो कों सीपीएमटी की तैयारी के लिए मुफ्त शिक्षा देना, मेरिट में आने वालो छात्रो कों इंजीनियर बनाना आदि -२ . .... प्रदेश सरकार ने चुनाव से पहले इतनी सारी घोषणाओ के तीर जानता के लिए छोड़ तो दिए ...... लेकिन ये तीर कहा जाकर गिरेगे और कोन-२ लोग इनका लाभ उठायेगे... ये तो आने वाला भविष्य ही तय करेगा .....
छत्तीसगढ़ की राह चलते हुए प्रदेश सरकार ने बीपीएल परिवार के लिए दो रूपये किलो गेहू ,तीन रूपये किलो चावल देने की घोषणा की मुख्यमंत्री ने एपीएल परिवारों के लिए आठ रूपये किलो गेहू ,दो रूपये किलो चावल देने की बात कही ...मुख्यमंत्री निशंक ने उत्तराखंड की जनता कों ये संकल्प दिया की प्रदेश में कोई भी व्यक्ति अब भूखा नहीं सोयेगा ....लेकिन मुख्यमंत्री कों कोई ये कोन बतायेगा की देश कों 80 फीसदी आबादी 9 रूपये से 20 रूपये पर गुजर बसर करती है....तो फिर किन लोगो कों भूखा न सोने की बात करते है ...

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की पुण्य तिथि पर अटल खाद्दान योजना का शुभारम्भ बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी ने किया...गडकरी ने ये भी बताया की जहा देश की 80 फीसीदी आबादी बीस रूपये पर गुजर बसर करती है, वही उत्तराखंड राज्य सरकार गरीबो की प्रति वचनबद्ध है ...राज्य लगातार प्रगति के शिखर पर पहुच रहा है ...राज्य की विकास दर जहा 9.41.% हुआ करती थी आज वही 41% पर जा पहुची ...तेजी से प्रगति करने वालो राज्य में उत्तराखंड कों प्रथम पुरस्कार उपराष्टपति के हाथो दिया गया ...गडकरी ने गरीबो के प्रति कल्याणकारी योजनाओ कों सफल बनाने की बात कही ...
चुनावी माहोल के इस दोर उत्तराखंड में एक बार राज्य सरकार योजनाओ का सहारा लेकर वोट पाने की राजनीति एक बार फिर से सर चढ़ कर बोलने लगी है ...चाहे सत्ता पक्ष या फिर विपक्षी दल या फिर अन्य दल हो चुनाव के नजदीक आते ही सभी कों गरीबो के प्रति चिंता सताने लगती है ...केंद्र सरकार जहा एक और मनेरगा के माध्यम से गरीबो कों अपनी और आकर्षित करती है ...वही राज्य सरकार गरीबो कों सस्ते दामो पर खाद्दय भोजन देकर जनता कों खुश करना चाहती है ...बात बराबर है सभी राजनितिक दल एक ही थाली के चट्टे बट्टे है .... कोई किसी से कम नहीं है...वैसे भी राज्य सरकार का सिंहासन इस बार खतरे में है.....

करीब चार साल से गहरी नींद में सोयी राज्य सरकार कों अब इन योजनाओ कों याद आ रही है .... वो भी तब जब चुनाव नजदीक है अब इसी से अंदाज़ा लगाया जा सकता है की राज्य सरकार कों गरीबो की चिंता कम वोट पाने की चिंता सबसे ज्यादा है ...गरीबो की रोटी पर सवाल अब से पहले भी उठे है, और अभी भी उठते रहे है .....सरकार चाहे किसी की भी क्यों न हो बदलाव की उम्मीद किसी से नहीं की जा सकती .....


वर्जन ---"-जिस दोर में पत्रकारिता आज अपने उत्कर्ष शिखर पर पहुची है ऐसे दोर में भ्रष्ठचार और घोटाले का बाज़ार भी गर्म रहा है.....राज्य सरकार ने शासकीय पत्रकारों कों आवसीय कालोनी देनी की घोषणा वैचारिक रूप से की है...पत्रकारों कों आगे आकर संगठन के रूप में काम करना होगा" ......
मीडिया सलहाकार समिति अध्यक्ष( उत्तराखंड) -----------देवेन्द्र भसीन