30/08/2014

दंगाई तो नंगे होते है


सहारनपुर शहर से मेरा कोई पुराना नाता तो नहीं है लेकिन मैने इस शहर को करीब से जाननें की बहुत कोशिश कि और पहली बार सहारनपुर जिले की सरज़मी पर जब मेरे कदम पड़े तो इस शहर ने मुझे पहली बार में ही अपनी ओर आकर्षित किया. कहते है कि ‘फर्स्ट इम्प्रेशन इज द लास्ट इम्प्रेशन’ ठीक कुछ वैसा ही मेरी साथ हुआ. पहली बार में ही सहारनपुर ने मुझे मेरठ शहर जैसा अहसास कराया था. मेरठ और सहारनपुर के बीच का फासला यहाँ बोली जाने वाली केवल क्षेत्रीय भाषा का ही है. राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से सहारनपुर की दूरी करीब 150 किमी है. पश्चिमी उत्तर प्रदेश के ये तीनों जिले (मेरठ, मुजफ्फरनगर और सहारनपुर) दंगा प्रभावित और अतिसवेंदनशील क्षेत्र है. तीनों जिले में गन्ने की फसल की पैदावारी अच्छी खासी होती है. दिल्ली से सहारनपुर का रास्ता वाया मेरठ और मुजफ्फरनगर होकर जाता है. यूपी का सहारनपुर जिला हरियाणा, पंजाब और उत्तराखंड की सीमा से सटा हुआ है. उत्तराखंड बनने से पहले सहारनपुर हरिद्वार जिले के अंतर्गत ही आता था.
दंगे का दंश झेल रहा यूपी आज पूरे देश में सबसे अराजक राज्यों की सूची में शुमार होचला  है और अपराध में मामले में पहले पायदान पर जा खड़ा हुआ है. पश्चिमी यूपी को हरित प्रदेश का दर्जा देने के लिए राज्य में कई बार सियासी तूफान भी आए लेकिन यह हरित प्रदेश न होकर दंगाई प्रदेश में ज़रूर शामिल हो जायेगा. राज्य में आए दिन खूनी खेल का ग्राफ लगातर बढ़ता जा रहा है जोकि एक चिंता का विषय बना हुआ है. राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी है जिस कारण एक समुदाय के लोगों में दूसरे समुदाय के प्रति हिंसा कूट कूटकर भरी हुई है. राज्य में हर समुदाय के लोग अपने को असुरक्षित महसूस किए हुए है. राज्य का पुलिस प्रशासन इतना कमजोर है कि वह कोई भी कदम बिना हाई कमान के आदेश के खिलाफ़ नहीं उठा सकती. चाहे उसके सामने अपराधी अपराध ही क्यों न कर रहे हो.

ऐसी कानून व्यवस्था से यूपी की जनता तिरस्त आ चुकी है. सपा सरकार दंगाईयों पर काबू पाने के लिए विफल है. शहर दर- शहर दंगे हो रहे है लेकिन सरकार और प्रशासनिक तन्त्र मूकदर्शक बनकर देखती रहती है. वैसे तो देश में खाकी वर्दी वालों को फ़रिश्ता कहा जाता है कि जब भी किसी पर कोई मुसीबत आती है, तो देश के ये रहनुमा शक्तिमान की तरह लोगों की जान बचाते है लेकिन अब यूपी पुलिस खुद अपनी जिम्मेदारी से भाग रही है. शहर दंगे की आग में जल रहा होता है लेकिन पुलिस प्रशासन घंटों बाद मौके पर पहुँच कर अपनी कार्यवाही करती है. दंगा पीड़ित जब इन खाकी वर्दी वाले फरिश्तों से मदद की गुहार लगाते है तो खाकी वर्दी वाले “वेट एंड वाच” का तमगा देकर आगे चले जाते है और पीड़ित पुलिस के सामने ही दम तोड़ देते है. ऐसे में सवाल पुलिस पर इसलिए खड़े हो रहे है कि आखिर पुलिस के हाथ क्यों पीछे बंधे है और किस लिए बंधे है. राज्य की सपा सरकार में अब तक 400 दंगे हुए सभी ने पुलिस प्रशासन पर ही सवाल खड़े किए है. मुजफ्फरनगर दंगे के घाव अभी सही से भरे भी नहीं थे कि दंगा पीड़ित पडोसी जिला सहारनपुर भी दंगे की भेंट चढ़ गया.

सही में दंगाईयों का न तो कोई माँ - बाप होता है और न ही कोई भाई - बहन, दंगाई तो नंगे होते है. इसमें न तो किसी की जात पात देखी जाती है और न ही किसी का मजहब, दंगे में जो भी भेंट  चढ़ता है उसी को शिकार बनाया जाता है. करीब दस महीने पहले मुजफ्फरनगर दंगे के बाद से पश्चिमी यूपी में मुरादाबाद के काठ कस्बे में 6 जुलाई को मंदिर से लाउडस्पीकर उतारे जाने को लेकर जो बवाल उठा वह भी देश की जनता ने देखा और सहारनपुर में गुरुदुवारा निर्माण को लेकर कुछ असामाजिक तत्वों ने दंगे को जो हवा दी वह भी देश के सामने आ चुकी है. असमाजिक तत्व दंगे को हवा तो दे देते है लेकिन भेंट चढ़ता कौन है सिर्फ वही लोग जिसका इस दंगे से कोई वास्ता नहीं होता है. आखिर उन बेगुनाहों का क्या कसूर था ? जो इनको कीड़े मकोड़े की तरह मसल दिया गया. 22 मई 1987 का (मेरठ) हिन्दू - मुस्लिम दंगा आज भी लोगों के दिलों में खटास पैदा किये हुए है जिसके चलते यहाँ के लोगों के दिलों में आज भी घाव ताज़ा है. 1987 के दंगे में 42 मुस्लिम युवकों की हत्या कर दी गई थी. आज भी इस दंगे का नाम सुनते ही उस वक्त के लोग कांप उठते है क्योंकि इस दंगे ने इतने घाव मेरठ को दिए है कि इसकी भरपाई कर पाना मुश्किल है.  

भारतीय परम्परा में हिन्दू-मुस्लिम, सिख-ईसाई वाला नारा, देश को हर मुल्क में एक सन्देश देती है कि भारत सर्वधर्म, सद् भाव वाला देश है जिसका सबसे बड़ा धर्म होता है राष्ट्रधर्म. ग्लास्गो कॉमनवेल्थ गेम्स में भारत के सभी धर्म संप्रदाय के एथलीटों ने अपना बेहतरीन प्रदर्शन किया. यह इसीका नतीजा रहा कि भारत एक जुट होकर खेला, आज भी भारत के  ताकत के सामने सारी ताकतें छोटी साबित हो चली है.  देश असमाजिक तत्व और गन्दी राजनीति के दलदल में इस कदर फंसता चला जा रहा है कि जिसके चलते देश में अराजकता का माहौल बढ़ा है. दंगे सिर्फ मजहब, पैसा और कुर्सी के लिए ही कराए जाते है जिसके लिए सिर्फ राजनीतिदान ही जिम्मेवार होते है.

                                    
जिस सहारनपुर में बाबा लालदास और हाजी शाह कलाम की दोस्ती की मिसाल दी जाती है. आज वही जिला दो संप्रदाय में बंट गया है. यूरोप 14 वीं सदी तक समाज असभ्य था. उनका विज्ञान-धर्म के बीच विवाद था उन्होंने इस झगडे को समाप्त किया और वे तरक्की कर गए लेकिन हम हजारों सालों से सभ्य समाज थे मगर हम सियासी चालों के चक्कर में पड़कर असभ्य हो गये है और आज हालत हमारे सामने है. यह भी इसीका परिणाम है कि देश में सिर्फ दंगे की बलि सिर्फ बेगुनाह लोग ही चढ़ते है. 22 बरस बाद सहारनपुर फिर से दंगे की चपेट में आ खड़ा हुआ. साप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक माना जाने वाला यह शहर पहली बार 1982 में दंगे की भेंट चढ़ा था जब मंडी थाना क्षेत्र चिलकाना रोड पर मंदिर-मस्जिद मिली हुई थी तब भी दीवार के निर्माण को लेकर भारी बवाल हुआ था. जब भी कई लोगों की मौते हुई थी.

वर्ष 1991 में रामनवमी जुलूस के दौरान भी शहर में दंगा भड़का था. उस वक्त भी रमजान चल रहे थे. तब धार्मिक स्थल के पास बैंड बजाने को लेकर विवाद हुआ था. जिसने देखते ही देखते दंगे का रूप ले लिया था. वर्ष 1992 में अयोध्या राम मंदिर मामले की चिंगारी भी सहारनपुर तक पहुचीं थी और तब भी शहर की दुकानों में लूटपाट की गई थी और लोगों को कर्फ्यू में रहना पड़ा था. गंगा जामुनी तहज़ीब और आपसी भाईचारे की एक अनूठी पहचान रखने वाले सहारनपुर को 1997 में जिले का दर्जा दिया गया. दुनिया भर में लकड़ी के काम के लिए मशहूर सहारनपुर को आखिर किसकी नज़र लगी जो देखते ही देखते ही दंगे की आग में जल उठा ओर शहर खौफ के साये में जीने लगा. आखिर यह आग क्यों लगी इस आग ने दिलों में ऐसा दर्द दिया जिसके जख्म को भरने में अभी समय लगेगा.


करीब बीते एक बरस पहले मुजफ्फरनगर दंगे के दौरान खुराफातियों ने भी यहाँ की फिजा को बिगाड़ने की खूब कोशिश की थी लेकिन यहाँ के लोगों ने आपसी भाई चारे के लिए हर तरफ हमेशा से मौर्चा संभाले रखा मगर लोकसभा चुनाव के दौरान माहौल में जो खटास आई वह अभी तक बनी हुई है जिसके चलते चुनाव में मतों का ध्रुवीकरण हुआ सहारनपुर दंगे के बाद से राज्य सरकार सतर्क ज़रूर हुई है लेकिन अभी भी कहीं न कहीं यह पूरा मामला अब राजनीति पर जाकर टिकता नज़र आ रहा है.        

15/02/2014

बंगाल, भाजपा और मोदी


ज़ेहन में जब भी भाजपा का नाम बंगाल को लेकर याद किया जाता है तो यह मन से इसलिए नहीं उतरता क्योंकि बंगाल में भाजपा चारों खाने चित है । इस संगठन को यहाँ मजबूती देना वाला कोई है नहीं । अगर भाजपा बंगाल में मोदी के आसरे केसरिया फहराना चाहती है तो यह अभी दूर की गोटी होगी यानि जिस बंगाल में भाजपा का ताना बाना अस्सी के दशक में बुना गया था । वह अभी तक अपना कोई खास असर नहीं छोड़ पाया है । भाजपा के लिए बंगाल को लेकर सवाल इसलिए बड़ा हो चला है क्योंकि  बंगाल पर अगर उसे फतह हासिल करनी है तो यह अकेले मोदी के बूते संभव नहीं, ऐसे में भाजपा की मुश्किल यह है कि वह जाये तो जाये किसके साथ? बंगाल का वर्तमान राजनीतिक अंकगणित यह बताता है कि मोदी वामपंथ के साथ इसीलिए नहीं जा सकते क्योंकि उन्होंने कोलकता रैली के ज़रिए पहले ही संकेत देकर यह जतला दिया था कि वामपंथ ने देश को थर्ड ग्रेड बनाने का काम किया है । ममता ने यूपीए से नाता तोड़कर अभी किसी दल की ओर जाने के संकेत नहीं दिए है । कांग्रेस वामपंथ के साथ इसलिए जा सकती है क्योंकि कांग्रेस के लिए वामपंथ के अलावा अब कोई विकल्प नहीं है । वैसे भी कांग्रेस के खाते में मालदा की एकमात्र लोकसभा सीट है । यह सीट भी गनी खान चौधरी और उनके परिवार के प्रभाव के चलते मुमकिन हो सकी, लेकिन अब गनी खान नहीं हैं और उनके भाई विधायक अबू नासेर ने भी राज्यसभा चुनाव में तृणमूल के ही पक्ष में मतदान किया । 
             
ऐसे में यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि बंगाल में भी आम चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों में एक अजीब सी बेचैनी है । 2011 के विधानसभा चुनाव की हार से वामपंथ पहले ही सदमें है और इसी के चलते वामपंथ का जनाधार भी छिटकता जा रहा है । ममता बनर्जी ने बंगाल का किला अगर माँ, माटी मानुष के आसरे हासिल किया तो उनके सामने राज्य को विकास की पटरी पर लाने के लिए अभी बहुत सी चुनौतियां है । लेकिन पिछले कई महीनों से ममता सरकार की जो फज़ीहत देखने को मिली उससे तो यही लगता है कि जनता का विश्वास अब टीएमसी पर से उठने लगा है । ममता ने भले ही कोलकाता रैली के ज़रिए यह बताने की कोशिश की हो कि देश में तृणमूल कांग्रेस ही बस एक विकल्प बचा है और महाश्वेता देवी भी ममता की तारीफों के पूल बांधते हुए यह जतला दे कि ममता भी देश के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल है, यानि मतलब साफ है कि ममता को अब विरोधियों को अपने पक्ष में करने का महारत हासिल हो चूका है करीब सात बरस पहले जो महाश्वेता देवी नंदीग्राम घटना के दौरान ममता के विरोध में खड़ी थी, आज वही ममता के साथ खड़ी है । कैसा अजीब संयोग है ! कहते हैं कि राजनीति में सब कुछ मुमकिन है । लेकिन अब समय बदल चूका है दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पार्टी की नज़र अब देश के सभी बड़े महानगरों पर जा टिकी है । बंगाल में आये दिन पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या बढती देख टीएमसी को एक नया विकल्प अब मैदान में दिखने लगा है ।     

बंगाल में भाजपा, जहाँ मोदी के आसरे बंगाल की लाल ज़मीन को केसरिया में बदलना चाहती है, वहीँ  कोलकाता रैली में उमड़ी भीड़ से मोदी को बंगाल में लोकसभा चुनाव से पहले ही परिवर्तन की खुशबू आने लगी है । आज मोदी 2014  के आम चुनाव की उस दहलीज़ पर जा खड़े है जहाँ से उन्हें अब लाल किले का लाल रंग दिखाई देने लगा है यानि मोदी का सपना बंगाल में केसरिया फहराना है और 2014 में 272 के आंकड़े को भी छूना है । बंगाल में भाजपा को मोदी के ज़रिए इतिहास रचना होगा तभी लाल बंगाल को केसरिया में बदला जा सकता है । सपनों के पंख लगाये मोदी देश भर में जाकर गुजरात के विकास मंत्र से भाजपा के लिए ज़मीन तैयार करने में लगे है । इस मंत्र का असर कितना  पड़ेगा यह तस्वीर कुछ ही महीनो में साफ़ हो जाएगी । भाजपा ने 2001 के विधानसभा चुनाव में भी बंगाल में केसरिया फहराना चाहा था लेकिन हासिल कुछ भी नहीं हो सका । बंगाल में भाजपा के लिए सवाल इसलिए बड़ा ज़रूर है क्योंकि भाजपा अगर दक्षिण (कर्नाटक) राज्य में केसरिया फहरा सकती है तो बंगाल में क्यों नहीं?    

बंगाल में मोदी ने रैली के ज़रिए जो बाण वामपंथियों पर साधे उसकी धमक से थर्ड फ्रंट में भी एक हलचल ज़रूर पैदा हुई । लेकिन मोदी ने इशारों ही इशारों पर ममता की तारीफों के कसीदे भी पढ़े । ममता किस ओर जाएँगी यह अभी कुछ साफ़ नहीं है, क्योंकि अगर याद करें तो 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी कोलकाता आये थे तो ममता ने ही अटल जी के साथ मंच साझा किया था यानि जो छवि अटल जी की एनडीए में रही, वो मोदी है नहीं । बंगाल में भाजपा तो अटल सरकार के समय में भी नहीं थी ।  लेकिन जिस छवि के आसरे ममता ने भाजपा का दामन थामा था वैसी छवि अब भाजपा की नहीं है । ममता के लिए सवाल अब भाजपा का नहीं, बल्कि उसके चिंता का कारण है कि अगर वामपंथ फिर से अपना खोया हुआ जनाधार खड़ा कर गया तो वह अपनी ज़मीन गँवा सकती है । भाजपा को बंगाल में अधिक सीटें मिलना थोडा मुश्किल है । क्योंकि यहाँ पार्टी संगठन कहीं न कहीं मजबूत नहीं है । लेकिन भाजपा का वोट प्रतिशत ज़रूर बढ़ सकता है । प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी बंगाल को जो आईना गुजरात विकास मन्त्र के ज़रिए दिखाकर गए हैं । यह छवि कितनी साफ़ होगी इस पर आम चुनाव के बाद ही कुछ कहा जा सकता है  

12/01/2014

बंगाल में ममता का टूटता तिलिस


पश्चिमी बंगाल में ममता का सिहांसन डोलने लगा है. बंगाल में ममता का प्रभाव अब तक कोई खास असर नहीं छोड़ पाया है. ममता बनर्जी ने जिन मुद्दों के आसरे करीब 35 साल के वाम पार्टी के किलों को ध्वस्त किया था. उससे तो यही लगता था कि ममता बेनर्जी राज्य के लिए एक नई दशा और दिशा तय करेगी लेकिन ममता के सभी दावे छोटे और बोने साबित होते दिखे है. हाल ही में कोलकाता मध्यग्राम रेपकांड को लेकर तृणमूल कांग्रेस की फ़जीहत साफ़ देखी गई. बंगाल के मालदा और सिलीगुड़ी बम धमाकों के बाद से लेकर भी ममता का रूतबा कम हुआ है. विपक्षी दल सड़कों पर उतरकर अपने इस आन्दोलन को हवा देने में लगे है. साथ ही साथ भाजपा और कांग्रेस भी ममता को चारों से घेरने में लगी हुई है.

                                    
करीब 35 साल से बंगाल की सियासत का स्वाद चखे बैठा वाम दल अब फिर से एकजुट होता दिख रहा है. ऐसे में वाम पार्टी के बिखरे हुए लोगों का फिर से सक्रिय होना ममता के लिए परेशानी का सबब बन सकता है. वो भी ऐसे दौर में जब देश में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार को लेकर नरेंद्र मोदी चर्चा में बने हुए है. ऐसे में अगर मोदी का जादू पश्चिमी बंगाल में चलता है तो दीदी के लिए संकट घेरा सकता है. राज्य में भाजपा पहले से बहुत ख़राब स्थिति में है. 2014 के लिए मोदी को बंगाल से सीटें निकाल पाना सबसे बड़ी चुनौती बनी है. बंगाल में अगर मोदी अपना प्रभाव छोड़ने में कामयाब होते है तो वाम पार्टी के लिए रास्ता साफ़ हो जाएगा लेकिन ममता की किरकिरी होना कहीं न कहीं उनके अपने अंदर के नेताओं का एक ऐसा बड़ा समूह है जो टिकिट और पद की चाह में अभी से गुणा भाग करने लगे है. तृणमूल कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुसीबत वो लोग खड़े किये है जो वाम दल छोड़कर टीएमसी में शामिल हुए, यही लोग पार्टी को अंदर ही अंदर खोखला करे जा रहे है.
राज्य को हसीन सपने दिखाने वाली ममता अब खुद ही इन सपनों के चक्रव्यूह फंसती जा रही है. 35 साल से बंगाल का विकास सही से अपनी पटरी पर नहीं लौट सका तो अब क्या उम्मीद की जा सकती है? राज्य में बढ़ रही लगातार रेप की घटनाओं से बंगाल की स्थिति भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और दिल्ली एनसीआर जैसी हो गई है. कभी ममता की मुखालफ़त करने वाली महिला वामपंथी संगठनों ने अब एकजुट होकर मुख्यमंत्री के खिलाफ़ हल्ला बोल दिया है. मध्यग्राम रेपकांड के बाद से बंगाल की जनता का गुस्सा टीएमसी के खिलाफ़ सातवें आसमान पर है. जनता इसका जवाब आने वाले लोकसभा चुनाव में देंगी. मौजूदा दौर में अब सभी राजनीतिक दल ममता के विरोध में खड़े है.वाम पार्टी द्वारा खेली जा रही मामा सकुनी वाली चाल ममता को ओंधे मुहँ गिरा सकती है.
कुछ दिनों पहले जब मेरी मुलाकात जब वाम पार्टी के एक घोर समर्थक कार्यकर्ता से हुई. मैंने जब उससे बंगाल की राजनीति के बारे में जानने की कोशिश कि तो उसनें सारी बातें मेरे सामने बड़े ही अच्छे ढंग से रखी. उसका कहना था कि ममता अभी वाम पार्टी को सही से नहीं पहचान पाई. वाम दल के कुछ बड़े नेता जो पार्टी छोड़कर टीएमसी में शामिल हुए है वही एक दिन ममता के सिंहासन के लिए बड़ी मुसीबत खड़ी कर सकते है. टीएमसी संसद सोमेन मित्रा पार्टी छोड़ चुके है. सोमेन अब बंगाल से कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल है. साफ तौर अगर देखा जाए तो पर टीएमसी के नेताओं में बड़ी बगावत ममता के खिलाफ़ शुरू हो चुकी है. जनता की जो अपेकक्षाएं ममता दीदी से थी वो अब कहीं न कहीं हवा हवाई होने लगी है .
ममता के राज में शराब तस्करी बड़े पैमाने पर खुलेआम हो रही है. दुर्गा पूजा में भी ममता बनर्जी ने चौबीसो घंटे शराब के ठेके खुले रहने की बात कही थी इस पर भी विपक्ष ने खूब हंगामा किया था. पश्चिमी बंगाल के मिदनापुर जिले के आमलासोल क्षेत्र में औरतें कच्ची शराब सड़कों पर बैठकर बाज़ार में बेचती है. आमलासोल का इलाका कोकराझार से लगा हुआ है. अभी कुछ दिनों पहले ममता ने यहाँ की जनता को संबोधित करते हुए कहा कि यहाँ की जनता अब कभी भूखी नहीं रहेगी यानि ममता दी जनता के बीच जाकर जो वादें करती है वो फाइलों तक ही सीमित हो जाते है. ममता जहाँ राज्य के युवाओं को आगे बढ़ने की बात को लेकर तरह तरह के तर्क जनता के सामने रखती है उसका युवाओं पर कोई खास असार नहीं है लेकिन आमलासोल के युवाओं का भविष्य शराब में नशे में चकनाचूर हो रहा है. उन्हें नशे के आलावा कुछ नहीं दिखाई देता है इलाके के लोग सब्जी कम और शराब की खरीदारी ज्यादा करते है. यहाँ सबसे बड़ा सवाल अब शराब तस्करी का भी है.
राज्य में 5 फरवरी को मोदी की रैली कोलकाता में होने जा रही है. जनता का जनमत किस ओर है यह तो रैली से ही पता चल जायेगा यानि मोदी के बलबूते भाजपा राज्य में कमल खिलना चाहती है लेकिन यह अभी भविष्य के गर्भ में है. जब से वरुण गाँधी को बंगाल की कमान सौंपी गई है तब से उनका लगातार भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच सक्रिय होना यह साफ ज़ाहिर करता है कि भाजपा की धूमिल छवि से कुछ धूल तो हट ही सकती है.
ममता की छवि को धूमिल करने के लिए भी वाम दल पूरी ताकत के साथ टीएमसी को चारों ओर से घेरने में लगा है. ममता को पिछले चुनाव की अपेक्षा इस बार लोकसभा चुनाव में कम सीटें मिलने के असार भी नजर आने लगे है. ममता ने कांग्रेस से नाता तोड़कर बंगाल की जनता पर भले ही यह भरोसा कायम किया हो कि हम कांग्रेस की रणनीति के खिलाफ़ है लेकिन टीएमसी की रणनीति भी तो राज्य में पूरी तरह से फ्लॉप होती दिख रही है. ममता ने राज्य में जिस तरह से बंगाल में नेताओं को टॉप ऑर्डर के तहत बल्लेबाजी करना का मौका दिया था. अब वही टॉप ऑर्डर एक के बाद एक बिखरता जा रहा है. ऐसे में सवाल अब ममता की साख और सियासत का भी हो गया है यानि ममता का टॉप ऑर्डर बिखर रहा है और जनता नेताओं को फ्लॉप करार दे रही है. मौजूदा दौर में ममता के पास अभी भी कई मौकें है राज्य को पटरी पर लाने के, नहीं तो ममता को आगामी लोकसभा चुनाव के साथ – साथ विधानसभा चुनाव में बहुत भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
कोलकाता महानगर में आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं का रुतबा बढ़ता देख टीएमसी को एक नया विकल्प दिखने लगा है. महानगर में क्राइम की घटनाओं का ग्राफ तेज़ी से बढ़ रहा है. रोजाना ममता के खिलाफ़ विरोध प्रदर्शन से महानगर की जनता टीएमसी से ऊब चुकी है. करीब पिछले 4-5 महीनों से राजधानी में कई बड़ी हिंसक घटनाएँ हुई लेकिन ममता का प्रशासन किसी काम का नहीं रहा. ममता दीदी सही में अगर बंगाल का विकास चाहती है तो उनको अभी से संभलना होगा नहीं तो फिर ममता का तिलिस्म टूटने के कगार पर है.                                                                                                                                                  
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                       

23/04/2013

“मेरठ है भारतीय जनता पार्टी का सबसे बड़ा समर्थक”




मेरठ - हापुड़ लोकसभा सीट से बीजेपी सांसद राजेन्द्र अग्रवाल की मीडिया शोधार्थी ललित कुमार से सीधी  बातचीत------------
                                   
सवाल:  मेरठ- हापुड़  लोकसभा सीट पर चुनाव के दौरान जो वायदे जनता से आपने किए थे उन पर आपने कितना ध्यानअभी तक दिया  है ?
जवाब: मेरठ - हापुड़ शहर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के दोनों ही बड़े प्रतिष्ठित शहर है दोनों ही शहर की अपनी - अपनी पहचान है ये दोनों ही क्षेत्र एनसीआर क्षेत्र के अधीन है २००9 लोकसभा चुनाव से पहले हापुड़ मेरठ का हिस्सा नहीं था लेकिन परिसीमन के चलते इसको मेरठ - हापुड़ लोकसभा सीट कर दिया गया में आपको बात दूँ जब एनसीआर प्लानिग बोर्ड बना था तो इसके पीछे केंद्र सरकार की मंशा यह थी कि दिल्ली से आने वाले लोगो को किसी भी प्रकार कोई मज़बूरी हो जिससे दिल्ली के कुछ बोझ को कम किया जा सके

दिल्ली के कुछ विभागों को इन क्षेत्रों में शिफ्ट कर दिया जाए लेकिन कुछ स्तर तक दिल्ली के दफ्तर नोएडा - गाज़ियाबाद में आए भी है मेरी योजना से पहले तो कोई दफ्तर आया और ही कोई विकास योजना आई. मेरी ओर से आप इसे वायदे के रूप में समझ सकते या फिर पहल के रूप में, इस क्षेत्र को में उचित स्थान दिलवाने की कोशिश कर रहा हूँ किस संबंध में मैंने लोकसभा में संसद पटल पर मैंने ६० से ज्यादा सवालों को रखा है और मेरे इन सवालो पर केंद्र सरकार ने भी ध्यान दिया है मेरठ और दिल्ली रेलवे लाइन का बिजलीकरण कार्य भी तेजी से हो रहा जो गाज़ियाबाद से सहारनपुर तक हैं   मेरठ से लखनऊ के बीच राज्यरानी एक्सप्रेस ट्रेन भी चलाई गई है और हाई स्पीड ट्रेन की बात भी लगभग तय हो गई हैं   वैसे मेरी ओर से कोशिश यह भी है कि दिल्ली हाट की तरह यहाँ पर मेरठ हाट बने हाई कोर्ट की बेंच हो,मेडिकल कॉलेज को अच्छे से अपग्रेड किया जाए मैंने मेरठ की चौ.चरण सिंह विश्वविधालीय को केन्द्रीय विश्वविधालीय, आकाशवाणी और दूरदर्शन की मांग को भी लोकसभा में प्रश्न काल के दौरान रखा है मेरठ को स्पोर्ट सिटी के नाम को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐसे तमाम विषयों को लोकसभा में चर्चा के दौरान रखा जिनकी यहाँ पर अपार सम्भावना है मेरी ओर से पूरा प्रयास है की मेरठ को तमाम सुविधाए मिले जो बाकि अन्य महानगरो में है  


सवाल:  मेरठ महानगर  की जनता के लिए आपके इन तीन साल के कार्यकाल में अब तक आपकी क्या  उपलब्धिया रही है ?
जवाब:- क्षेत्र के सांसद का काम कानून बनाना नहीं होता है उसकी उपलब्धियों को सडको, स्कूलों से नहीं नापा जा सकता और यह उचित मापदंड भी नहीं है विकास के सारे कामों की ज़िम्मेदारी राज्य सरकार की होती है जो फंड केंद्र सरकार की और से आते भी है उनकों खर्च करना भी राज्य सरकार का ही काम होता है हापुड़ शहर का पूर्वी इलाका फल पटटी के नाम से भी जाना जाता है यहाँ फल की उत्पादन क्षमता बड़े पैमाने पर होती है पूर्व प्रधानमंत्री चौ. चरण सिंह के जन्म स्थान को मैंने यहाँ के  किसानों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर फ़ूड प्रोसिंग केद्र खुलवाने की कोशिश है इससे किसानो को फायदा भी होगा और रोजगार के अवसर भी प्राप्त होंगे।  फ़ूड प्रोसिंग को लेकर केंद्र सरकार का ध्यान भी हापुड़ सीट की और गया है

सवाल: विपक्षी दल हमेशा से आपकी उपलब्धियों की निंदा करते रहे है इस पर आप क्या कहेंगे ?
जवाब: नहीं मै इस पर कुछ नहीं कहूँगा इन सबका अपना अपना नजरिया है

सवाल: कुछ राजनेताओ का यहाँ तक कहना है कि हमारे सांसद मेरठ शहर तक ही सिमट कर रह गए है और उन्हें मेरठ की ग्रामीण जनता की ज़रा भी सुध नहीं है आपकी इस पर क्या प्रतिक्रिया है ?  
जवाब: ऐसी टिप्पणियाँ तो लोग करते ही हैं आप गावों में जाकर पूछेंगे तो पता चलेगा की मैंने गावों का विकास कराया है में अपने लोकसभा क्षेत्र चार- चार, पांच- पांच बार दौरा करता हूँ. मै इन बातो की ओर ध्यान इसलिए नहीं देता कि ऐसी टिप्पणियाँ लोग करते ही है, यह कोई बड़ा तथ्य भी नहीं है. मै मेरठ की जनता का लिए हमेशा तैयार रहता हूँ   लोगों की समस्या को सुनने के लिए हमेशा तत्पर रहता हूँ मै सब जगह जाकर लोगों से अच्छे से मिलता हूँ  

सवाल: बड़े लंबे समय के बाद मेरठ शहर की सात विधानसभा सीटों पर पार्टी ने चार सीटे जीतकर सफलता अर्जित की है .इसका श्रेय आप किसे देना चाहेंगे ?
जवाब: मेरठ की सात विधानसभा सीटों में से चार सीटों की जीत का श्रेय क्षेत्र की जनता और  कार्यकर्ताओं का आभार मानता हूँ पश्चिमी उत्तर प्रदेश का मेरठ जिला हमेशा से बीजेपी का बड़ा ही समर्थक रहा हैं यह उसी का प्रमाण है कि क्षेत्र की जनता के कारण यह सब हुआ, मै क्षेत्र की जनता का एक बार फिर से अभिनन्दन करता हूँ  

सवाल: मेरठ की जनता  के लिए आपका विजन  क्या है ?
जवाब: मेरठ गंगा - ज़मुना के बीच बसा कृषि प्रधान क्षेत्र है जहाँ विकास की बड़ी ही अपार संभावनाए है यहाँ खिलाडियों के लिए एक स्टेडियम बनाना चाहिए मेरी कोशिश मेरठ को एक महत्तवपूर्ण दर्ज़ा दिलवाने की है जिससे क्षेत्र का विकास हो और रोजगार के नये - नये अवसर पैदा हों  

सवाल: मेरठ की तीन  बड़ी समस्याए और समाधान क्या है?
जवाब: मेरी नज़र से यहाँ आवगमन की सबसे बड़ी समस्या हैं शहर में दिन भर जाम लगा रहता हैं इसके लिए मास्टर प्लान की आवश्कता बहुत ज़रूरी है पार्किंग की व्यवस्था सही होनी चाहिए. शहर के बाहर बड़े बड़े बाईपास विकसित होने चाहिए जिससे यात्रियों को आने जाने में कोई परेशानी हो  

सवाल: शहर से कमेला हटवाये जाने को लेकर पार्टी नेताओ की चारो और चर्चाएं है आप इसे किस रूप में देखते हैं?
जवाब: कमेले को  शुरू से ही  हटवाने का प्रयास किया जाता रहा हैं और अंत में हम इसमें कामयाब भी हुए प्रदुषण का सबसे बड़ा कारण यहाँ पशु कटान था इस मुद्दे को मैंने कई बार लोकसभा में भी उठाया दिल्ली  से कई बार याचिका समिति की टीम ने निरीक्षण किया जब उन्होंने यहाँ की गंदगी को देखा तब जाकर यहाँ का प्रशासन सकते में आया। यहाँ के स्थानीय विधायक सत्ता का दुरूपयोग करके इसको साम्प्रदायिकता का कारण बताकर पल्ला छाड़ लेते थे और जबकि यह सांप्रदायिक मामला था ही नहीं और इससे दोनों वर्गों के लोग परेशान थे पर कुछ राजनेता इसको हिन्दू - मुस्लिम विषय बनाते थे अवैध तरीके से पशुकटान क्षेत्र को गन्दा करते थे

सवाल: लेकिन नगर निकाय मंत्री आज़म खां इस कामयाबी को पार्टी की सफलता मान रहे है।
जवाब: सफलता का श्रेय चाहे कोई भी ले मेरठ की जनता अच्छे से जानती है कि इसकी लड़ाई किसने लड़ी, आज़म खां की सरकार पहले भी थी तब क्यों नहीं उन्होंने इस मुद्दे को उठाया, नगर निकाय मंत्री  बनते ही सफलता का श्रेय पार्टी को देना चाहते है मुझे तो हंसी आती है मै समझता हूँ मेरठ की जनता पूरी तरह से वाकिफ़ है कि इस नरक से किसने आजाद कराया है

सवाल: इस बार के विधान सभा चुनाव में मेरठ की जनता ने बीजेपी को एक बार फिर से नई पहचान दी है। क्या आपको नहीं लगता की मेरठ की जनता का पार्टी से खोया हुआ विश्वास फिर वापस लौट है?
जवाब: ये तो मैंने शुरु में ही कहा है कि पार्टी का मेरठ की जनता के प्रति हमेशा से आदर रहा है और  छोटी-मोटी हार जीत तो चलती रहती है कभी भी बीजेपी ने मेरठ की जनता का विश्वास नही खोया। मेयर हमारा जीता, विधानसभा चुनाव में भी जनता ने भरपूर साथ दिया विधानसभा की चार सीटे जीताकर मेरठ की जनता ने फिर से जता दिया कि बीजेपी के साथ वो हमेशा से है इसमें कोई दोराय नही है और हमारी पूरी कोशिश है कि हम मेरठ की जनता की उम्मीदों पर खरा उतरे।


अब राष्ट्रीय राजनीति से जुड़े कुछ चुनिंदा सवाल

सवाल: जब भी पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक होती है तभी कोई कोई पार्टी का  शीर्ष नेता इस बैठक से खफा दिखाई देता है। क्या इसे बीजेपी की अंतर्कलह कहे या आपसी मतभेद ?
जवाब: हमारी पार्टी सही मायने में एक लोकतान्त्रिक पार्टी है जहा पर सभी को अपनी बात कहने का पूरा -पूरा हक़ होता है देश के किसी अन्य दल के अंदर तो लोकतंत्र है और ही ये बाते होती है हमारी पार्टी आज भी इकठठा पार्टी है कुल मिलकर हमारा बड़ा कुनबा है और बड़े कुनबे में ये छोटी-छोटी बाते होती रहती है

सवाल: पार्टी में येदुरप्पा, वसुंधरा राजे सरीखे जैसे राजनेता हमेशा से