11/10/2011

क्या नल के पानी से बुझेगी याकूब की प्यास............... ?




उत्तर प्रदेश में विधायको कों पार्टी से निकाले जाने का सिलसिला अभी लगातार बना हुआ है. जुमा -२ आठ दिन भी नहीं हुए थे की बसपा सुप्रीमो मुख्यमंत्री मायावती ने केबिनेट के शिक्षा मंत्री रंगनाथ मिश्र और श्रम मंत्री बादशाह सिंह कों मंत्री पद से हटा दिया. जुर्म दोनों मंत्रियो का बस इतना है कि लोकायुक्त की जाच में उन्हें दोषी पाया गया . बसपा पार्टी जिन दलितों और पिछडो वर्गों के आसरे उ. प्र. में राज कर रही है. उन्ही कों फिर से लुभाकर, दागदार मंत्रियो और भ्रष्ट्र नेताओ कों पार्टी से बाहर निकाल कर साफ़ छवि बनाने में जुटी है. और इन सब के बीच मायावती अपनी चुनावी बिसात भी बिछाने में भी लगी हुई है. मायावती के इन कड़े तेवर कों देखते हुए पार्टी का हर नेता खोफ खाया हुआ है. माया केबिनेट मंत्रियो की संख्या घटकर अब चार हो गई है.जिसमे से धर्मार्थ मंत्री राजेश त्रिपाठी, पशुपालन मंत्री अवधपाल यादव की भी छुट्टी कर दी गई .

आठ दिनों पूर्व मेरठ शहर विधायक हाजी याकूब कुरैशी कों बसपा से निष्कासित करने का मामला सामने आया था , हाजी याकूब सिखों पर बेहूदी टिप्पणी करने के मामले में पार्टी से निष्कासित किये गए है , याकूब के लिए अब बड़ा सवाल ये पैदा होता है की वे अपनी नवगठित यूडीएफ पार्टी कों किसके आसरे चलाए, वैसे भी पार्टी कों आगे बढ़ने की लिए जनाधार की आवश्यकता होती है वो याकूब के पास है नहीं, पार्टी चले तो चले किसके आसरे, सवाल बड़ा ही मुश्किल हैं. अब याकूब अपनी राजनीतिक प्यास कों बुझाये तो बुझाये कैसे ? सवाल ये भी बड़ा दिलचस्प है ? याकूब के पास बस एक मात्र विकल्प था, अजित सिंह की आरएलडी पार्टी, जिससे उनकी राजनीतिक प्यास बुझ सकती है, अंत में प्यासे कों नल के पास जाना ही पड़ा, याकूब कों पार्टी से निकलने के बाद कयास तो यही लगाये जा रहे थे कि याकूब अजित से हाथ मिला सकते है.लेकिन मौका परस्ती लोग मौका कभी गवाना नहीं चाहते

मेरठ के फैज़ ए - आम इंटर कालिज के मैदान में याकूब ने "मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत" का आयोजन कराया, इस आयोजन का सारा काम याकूब और उसके बेटे हाजी इकराम कि देख रेख में हुआ, जहा याकूब ने अपने बेटे हाजी इकराम कों इसी महापंचायत के ज़रीय आगामी विधानसभा चुनाव के लिए परमोट किया. तो वही राष्ट्रीय लोकदल के मुखिया अजित सिंह ने भी इस महापंचायत में शिरकत ली. मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत में इस तरह से अजित सिंह का शरीक होना कही न कही यही दर्शाता है की याकूब अब अजित सिंह के नल से अपनी राजनीतिक प्यास बुझाएंगे. जब मुस्लिम उलेमाओं को याकूब की असलियत पता चली तो उन्होंने इस महापंचायत कों राजनीति का अखडा बताकर इसका बहिष्कार कर दिया.

क्या फैज़ - ए आम इंटर कालिज का वही मैदान याकूब के लिए फिर से राजनीतिक भविष्य की नई ईबारत लिखेगा ? यही सवाल अब हर उस शख्स के ज़ेहन में गूंज रहा है जो यूडीएफ पार्टी से जुड़े है. अब से पहले याकूब ने इसी मैदान में कई सभाए की है. लेकिन इस बार फिर से मुस्लिमो कों लुभाने के लिए याकूब ने एक नई चाल चली, या यूँ कहे कि "मुस्लिम - किसान गठबंधन" की नई राजनीति, जो आगामी विधानसभा चुनाव में देखने कों मिल सकती है ( खासकर पश्चिम उत्तर प्रदेश में). याकूब के पास आरएलडी पार्टी ही एक मात्र विकल्प के रूप में उनके सामने थी. जिसके आसरे राजनीति में घुसा जा सके. याकूब ने अपनी राजनीति के शुरुआत जिस पार्टी से की थी उस पार्टी के भविष्य पर के बदरी के बादल छटने का नाम नहीं ले रही है. आए दिन उसके मंत्रियो का घोटाले और भ्रष्टाचार में संलिप्त पाये जाना हाजी याकूब कों रास नहीं आया. इसीलिए याकूब का कांग्रेस में जाने का मन नहीं था. याकूब के लिए आरएलडी ही एक मात्र ऐसी पार्टी है जहाँ उनको जगह मिल सकती है. मुस्लिम स्वाभिमान महापंचायत के बहाने याकूब ने अजित सिंह कों इस आयोजन में बुलाकर यहा जता दिया की याकूब अब आरएलडी के नल से पानी निकालेंगे .

आखिर इन सब के बीच याकूब की मंशा अपने बेटे कों सरधना विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाने कीऔर खुद कों मेरठ शहर की किसी भी विधानसभा सीट से प्रत्याशी बनाने की थी, लेकिन अजित सिंह की ख़ामोशी कुछ ज्यादा कह तो नहीं पाई,पर हाँ अजित ने मंच से इतना ज़रूर कहा की याकूब अगले महीने से अब आपके घर - २ घूमते मिलेंगे. तो कही न कही इस बयान से इतना साफ ज़ाहिर हो जाता है कि अजित सिंह भी मुस्लिम - किसान गठबंधन की राजनीति कों भुनाना चाहते है जिसका फायदा उन्हें इस विधानसभा चुनाव में मिले. लेकिन ये तो आने वाला वक्त ही तय करेगा की याकूब अपनी राजनीतिक प्यास कों नल के पानी से बुझाएंगे की नहीं .....

{ लेखक : ललित कुमार कुचालिया (प्रसारण पत्रकारिता)
( माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविधालीय भोपाल, म. प्र. ). और हाल ही में महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हिंदी विश्वविधालीय वर्धा, ( महाराष्ट) से एम्. फिल. ( जनसंचार ) का शोधार्थी है " "हरीभूमि" ( दैनिक समाचार) छत्तीसगढ़ में रिपोर्टर भी रहे. देहरादून --- "वोइस ऑफ़ नेशन" न्यूज़ चैनल में भी काम किया ....}

03/10/2011

पुरानी दुश्मनी का बदला...........


उत्तर प्रदेश में पार्टी से नेताओ का निकाले जाने का सिलसिला लगातार बना हुआ है..... आये दिन कोई न कोई नेता बीएसपी पार्टी से निलंबित किया जा रहा है..... कोई हत्या के प्रकरण में शामिल है, तो कोई विवादों कों लेकर अपनी लोकप्रियता बटौर रहा है.... लेकिन इस बार मामला है उ. प्र. के मेरठ से है . जहा बसपा से विधायक हाजी याकूब कुरैशी कों पार्टी से निष्कासित कर दिया गया,इस विधायक का कसूर इतना है कि उसने घोसीपुर में अस्थाई कमेले की नीव रखने के मौके पर सिखों के ऊपर बेहूदी टिप्पणी की ...... "याकूब ने सिखों की तुलना कमेले में काटने वाली भेसों से की" . इस भाषण से सिख समुदाय में इस समय ज़बरदस्त आक्रोश बना हुआ है ... याकूब इससे पहले भी विवादों के घेरे में कई बार आ चुके है.. चाहे डेनमार्क के कार्टूनिस्ट का सर कलम करने की बात हो, या फिर सिपाही कों थप्पड़ मारने का प्रकरण हो, लेकिन इस बार याकूब के लिए यह टिप्पणी भारी पड़ गई.... इसी के चलते सीएम् मायावती ने हाजी कों पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया ..... यह जानकारी प्रदेश अध्यक्ष स्वामी प्रसद मोर्य की ओर दी गई, ओर कहा की याकूब पार्टी के किसी भी कार्यक्रम में अब भाग नहीं लेंगे...

वैसे भी पैसे वालो नेताओ के लिए ये चीजे कोई मायने नहीं रखती, ये चिकनी मिटटी के घड़े की तरह होते है, जब चाहे कही भी फिसल जाते है ........ . पैसे के बल पर किसी भी पार्टी से जाकर जुड़ा जाते है.... लेकिन अब सवाल ये खड़ा होता है की जिस जनता के सहारे ये कुर्सी पर बैठते है... कही न कही जनता कों भी अपने चुने हुए प्रतिनिधि से कुछ न कुछ उम्मीद तो रहती ही है कि ये हमारे क्षेत्रो में अच्छा विकास हो .. लेकिन ऐसा हो नहीं पाता ... वो इसलिए जिन मुद्दों कों लेकर प्रत्याशी मैदान में उतरते है ..... यह केवल चुनाव तक ही सीमित होते है... जीतने के बाद सब गोल माल हो जाते है ..... इसमें कही न कही हमारे मतदाताओ की भी सबसे बड़ी कमी ये होती है कि उसे वोट डालने से पहले ये देख लेना चाहिए कि प्रत्याशी का कोई अपना व्यक्तित्व है भी की नहीं, क्या ऐसे ही जब मुह उठाये वोट देने चले गए ...... लेकिन हमारा मतदाता जानते हुए भी न जाने क्यों अनजान बन जाता है..... खासकर जिस दिन मतदान होता है........... ओर उसी का खामियाजा फिर पांच साल तक भुगतना पड़ता है .....

कुरैशी कों हाल में मेरठ शहर से दक्षिणी सीट पर प्रत्याशी बनाया था ... याकूब मुस्लिम समुदाय की कसाई बिरादरी से ताल्लुक रखते है, मूलरूप से ये बरादरी भेंसो का व्यापार करती है .. कुरैशी भी भेंसो के मीट के बहुत बड़े व्यापारी है. जिनका मीट देश- विदेशो में सप्लाई होता है... अब आप ही अंदाज़ा लगा सकते है कितना बड़ी हेसियत है इस इन्सान की .....शहर के बीचो - बीच कुरैशी के कई कमेले है जिनको लेकर हमेशा से विवाद होता रहता है... इस कमेले से निकलने वाला गन्दा पानी, बुरी बदबू वातावरण कों तो दूषित करता ही है.. और साथ ही साथ यहा से गुजरने वाले हर इन्सान का निकलना भी मुहाल हो जाता है .... कई बार मेरा भी इसी इलाके से गुजरना हुआ, लेकिन मुझसे भी नहीं रहा गया.. इस कमेले से सटी हुई शास्त्रीनगर कालोनी भी इसकी चपेट में है...स्थानीय लोगो दुवारा की गई शिकायत का असर शासन प्रशासन पर कोई मायने नहीं रखती क्योकि सारा मामला केवल राजनीति तक ही सिमट कर रह जाता है ....मामले की सुलह बीच में ही कर ली जाती है, अब आप ही सोचिए की पैसे ओर राजनितिक पावर के दम पर कैसे हर चीज़ घुटने टेक देती है, तो फिर कहा से आम जनता की समस्या का समाधान हो पायेगा ? बड़ा ही मुश्किल सवाल है जो मेरे जेहन में उठता रहता है, तो क्या ऐसे नेताओ से हम विकास की उम्मीदकर सकते है ?
वर्ष २००४ के लोकसभा चुनाव में मेरठ लोकसभा सीट से कुरैशी समुदाय के शाहिद अख़लाक़ कों बसपा से सांसद बनाया गया. जनता कों इनसे भी बहुत- सी उम्मीदे थी, लेकिन इनकी उम्मीदे भी जनता के लिए नागवार गुजरी, ज़रा याद कीजिए उस दौर कों जब उ० प्र० में वर्ष २००४ लोकसभा चुनाव के बाद नगर निकाय चुनाव हुए थे, उस समय सभी दलों ने अपने - अपने प्रत्याशियों कों चुनाव चिन्ह दिया था, लेकिन बसपा ने ऐसा नहीं किया, उसमें शाहिद अखलाख की पत्नि भी मेयर चुनाव के लिए मैदान में थी, बिना चुनाव चिन्ह के लिए सभी प्रत्याशियों कों काफी मशक्कत करनी पड़ी थी, जिसका फायदा भाजपा कों मिला ओर मेरठ से भाजपा की मेयर मुधू गुर्जर चुन ली गई... बस तब से ही शाहिद ने बसपा से कन्नी कटनी शुरू कर दी थी, ओर अपनी नई पार्टी के साथ सपा में जा शामिल हुए, काफी लम्बे समय से कुरैशी नेता मेरठ की राजनीति में अपनी साख बनाए हुए है, जनसंख्या में मामले में इनकी तादात न के बराबर है, मात्र पैसे के बल पर ये लोग राजनीति में है, न ही ज्यादा शिक्षित है ओर न ही राजनीति के मायने का पता, तो ऐसे नेताओ से क्या उम्मीद की जा सकती है ?

वर्ष २००७ की विधानसभा चुनाव में कभी बसपा के हमदम रहे याकूब ने अपनी एक नई पार्टी यूडीएफ के बदौलत मेरठ शहर से चुनाव लड़ा ओर भारी मतों से जीत भी गए , लेकिन उनके समर्थको ने जीत की ख़ुशी का इज़हार इस तरह से किया कि मानो दिवाली का त्यौहार मनाया जा रहा हो , खुले आम सडको पर हथियार लहराकर असमान में गोलिया दागी जा रही थी, कुछ समय के लिए तो पूरा शहर सहम - सा गया कि ये हो क्या रहा है ? यूडीएफ से विधायक बनने के बाद याकूब बसपा में ही शामिल हो गए , क्योंकि पार्टी पूर्ण बहुमत से जो जीती थी, सोचा था की पार्टी में कुछ तो कद बढेगा लेकिन मायावती ने याकूब कों पार्टी में कोई अहमियत नहीं दी, साल २००२ में जब बसपा की गठबंधन की सरकार बनी थी,तो कुरैशी खरखौदा विधानसभा सीट से जीते ,२००४ में जब बसपा सरकार बीच में ही किन्ही कारणों से गिरा दी गई थी, तो याकूब बसपा के २३ विधायको कों तोड़कर सपा पार्टी में जा शामिल हुए थे, मोटी रकम के बल पर विधायको की खरीद फरोख्त याकूब ने ही की थी, बस तभी से याकूब मायावती की आँखों में खटके हुए थे, आखिर कभी न कभी तो पुरानी दुश्मनी का बदला तो लेना था तो इससे अच्छा मौका ओर हो भी क्या सकता था,

२००४ में जब सपा की सरकार आई, तो हाजी याकूब कों अल्पसंख्यक राज्य मंत्री का भी दर्जा दिया गया, लेकिन उन्हें यह भी पार्टी रास नहीं आई ओर अंत में इससे भी रुखसत कर दिए गए, सवाल अब यह है कि आखिर अब वे किस पार्टी की ओर रुख तय करेंगे ? मामला बड़ा ही दिलचश्प है, याकूब ने अपना राजनीतिक सफ़र, अपने ताऊ कांग्रेसी नेता हकीमुद्दीन से प्रेरित होकर की, जो एक प्रभावशाली नेता होने के नाते शहर से कांग्रेस अध्यक्ष भी थे, तो क्या याकूब फिर से पुराने खेमे में जायेंगे या अपनी नवगठित पार्टी यूडीएफ कों पुनर्जीवित करेंगे? वैसे न्योता मिलने पर याकूब आरएलडी से भी हाथ मिला सकते है, मौका परस्ती लोग अच्छा मौका कभी नहीं गवाते है

अगला याकूब कौन होगा ? इसका डर हर किसी कों सता रहा है, कभी समाजवादी पार्टी के सिपसलाहकार रहे अमित अग्रवाल कों मायावती ने मेरठ केंट से प्रत्याशी घोषित किया था,ओर अंत में उन्हें भी पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया, हस्तिनापुएर सीट से विधायक योगेश वर्मा का भी इस बार टिकिट काट दिया, उनकी जगह अब प्रशांत गौतम कों इस बार हस्तिनापुर सीट से नया प्रत्याशी बनाया है, सरधना विधानसभा सीट से चंद्र्बीर सिंह पर भी तलवार लटकती दिख रही है, क्योंकि उनके भाई पर हत्या का आरोप जो लगा है , किठौर विधानसभा सीट से नये प्रत्याशी ओर खरखौदा विधानसभा सीट से विधायक लखीराम नागर पर हालाकि कोई आरोप नहीं है, इसीलिए उनकी जगह अभी सुरक्षित है, सिवालखास के विधायक विनोद हरित कों अभी कही से प्रत्याशी नहीं बनाया है, कुल मिलाकर ये कहा जा सकता की है , कि माया का अगला निशाना कौन होगा ?