05/09/2011

रामलीला मैदान में भ्रस्टाचारी रावण का अंत




जिस लोकतंत्र के सहारे देश चलता है. उसे देश कों कुछ चुनिन्दा लोग ही चलाते है. जिनको जनता संसद तक पहुचाए और संसद में बैठने वाले ये सांसद, अगर देश की जनता के साथ गद्दारी करे, तो जनता कों मजबूरन सडको पर उतरना ही पड़ेगा. आखिर हुआ भी वही जो देश की जनता चाहती थी. देश भ्रस्टाचारी तंत्र के चलते अंदर से खोखला होता चला जा रहा है, किसी कों भी इसकी चिंता नहीं है. भ्रस्टाचारी सरकार का सामना किया भी ऐसे 74 साल के वृद्ध ने जो सीधे सरकार की छाती पर जा बैठा और कहने लगा, अब बहुत हो चुका, अब और नहीं होने दूंगा. सरकार ने कभी सपने में भी नहीं सोचा होगा. कि महाराष्ट के रालेगण सिद्धि से चलकर कोई हमको टक्कर देगा .

गाँधीवादी अन्ना ने जब दिल्ली के रामलीला मैदान से एक नौजवान युवक कि तरह इन्कलाब जिंदाबाद और वन्दे मातरम, जैसे नारे लगाने शुरू किये तो मानो समूचा देश एक ही राह पर चल पड़ा और कहने लगा "में भी अन्ना तू अन्ना " अनशन के दौरान अन्ना जिस भी रूप दिखे , उस रूप के भी कई मायने हो सकता है. अन्ना कृष्ण रूप में भी हो सकते है क्योंकि जन्माष्ठमी भी अन्ना ने यही से मनाई , अन्ना राम रूप में भी हो सकते है. जिन्होंने भ्रस्टाचारी रूपी रावण का वध इसी रामलीला मैदान में किया. 288 घंटो का अनशन खत्म करने के बाद जब अन्ना अपने गाँव वापस पहुचे तो उनका स्वागत भी उसी अंदाज़ में हुआ. जैसे श्री रामजी का अयोध्या की वापसी पर हुआ था.

इस रामलीला मैदान के भी अपने कई मायने है ज़रा इन्हें भी समझ लेते है. इसी रामलीला मैदान से कई राजनितिक दलों ने रैलिया भी की थी. पाकिस्तान के जनक मोहम्मद अली जिन्ना ने 1945 में मुस्लिम लीग की रैली भी यही से हुई. 1965 में भारत के दूसरे प्रधानमंत्री लाल बाहदुर शास्त्री ने भी इसी मैदान से "जय जवान जय किसान" का नारा लगाया था. इंदरा गाँधी ने भी इसी मैदान से भारत की पाक. पर जीत के लिए रैली यही से की थी. 1975 में जे. पी.ने भी " सिंघासन खाली करो कि जनता आ गयी है " का नारा भी यही से लगाया था. उस वक्त भी जे. पी. के साथ जनता का पूरा जनसमर्थन था, 1777 में कांग्रेस छोड़ जनता पार्टी में शामिल हुए बाबू जगजीवन राम ने इसी मैदान से रैली की थी. 1990 में भी रामजन्म भूमि की गूंज के लिए भी यही से रैली हुई थी.

लेकिन 2011 में रामलीला मैदान के मायने ही बदल गए. इस बार रामलीला मैदान में पहली बार किसी गैर राजनितिक दल ने लोगो का ऐसा जनसैलाब इकठठा किया की मानो अब तक के सारे रिकॉर्ड ही धुवस्त हो गये. लेकिन जिस अन्ना के आसरे दिल्ली की सडको पर लोगो का जनसैलाब उमड़ा. उससे मतलब अब साफ हो चला है की देश की जनता अब चुप नहीं बैठने वाली है. आखिर इन सबके बीच दिल्ली का जे.पी. पार्क अन्ना के लिए ऐतिहासिक तो बन नहीं सका लेकिन रामलीला मैदान का नाम एक बार फिर से इतिहास के पन्नो में फिर से दर्ज हो गया .

रामलीला मैदान में अब तक जितनी भी रैलिया हुई वो सारी राजनितिक रैलिया थी. लेकिन इन सबके बीच किसी गैर राजनितिक दल ने देश की सरकार कों झुकने के लिए मजबूर कर दिया. और सरकार कों बता दिया की अन्ना के क्या मायने होते है ? जिस अन्ना के आसरे लोगो का जनसैलाब सडको पर उमड़ा, उन्होंने देश की सरकार के भीतर घुसे भ्रस्टाचारी रूपी रावण कों खत्म करनी की ठानी. एक ओर अन्ना का यह भी कहना है की यह तो अभी आधी जीत हुई है. कही न कही अन्ना का ये आन्दोलन आगे भी जारी रहेगा, इससे लगता कि अन्ना अब किसी से नहीं रुकने वाले नहीं है. जिस अहिंसावादी तरीके से यह आन्दोलन हुआ जिसको विदेशी मीडिया में भी तवज्जो मिली वो भी अपने आप में काबिले तारीफ है.

सवाल एक अन्ना का नहीं है सवाल है समूचे देश का जो भ्रस्ताचार की आग में झुलस रहा है.ऐसे में अगर एक अन्ना आगे आकर देश का प्रनिधित्तिव करे तो क्या बुराई है ? कहते है देश कों चलाने के लिए संसद के भीतर नई - नई परिभाषाए गढ़ी जाती है, लेकिन रामलीला मैदान में अन्ना ने देश कों चलाने के लिए, एक नई परिभाषा कों जन्म दिया. और बता दिया की देश अब आपकी परिभाषा से चलने वाला है. जो जनता तय करेगी वही अब आपको करना पड़ेगा. क्योकि संसद से बड़ी जनसंसद है.

रामलीला मैदान में जैसा इस बार हुआ देश के इतिहास में अब तक ऐसा कभी नहीं हुआ, राम रूपी अन्ना ने भारत सरकार के भीतर छुपे रावण का अंत तो कर दिया लेकिन लोगो के मन में अभी भी यही सवाल बना हुआ है कि देश में भ्रस्टाचार खत्म होगा कि नहीं
"इसलिए कहा जाता है की बुराई पर अच्छाई की जीत."

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें