01/03/2013

असम से आँखों देखी बराक वेळी का सच -----





असम से आँखों देखा सच का हाल में आपको इसलिए बताना चाहता हूँ कि असम की छवि जिस तरह से भारत में बनी है उसे अब भारत के बाकि हिस्से एक अलग नज़रिए से देखने लगे है। जिसकी तस्वीर हमारे जेहन में कोकराझार जैसे मसले को लेकर बनी है या फिर असम लगातार हिंसक त्रासदी के चलते हमेशा से सुखिंयो में बना रहता है। नॉर्थ ईस्ट के सभी 7 स्टेट हिंसक त्रासदी से नहीं उभर पा रहे है। असम में कांग्रेस की तीसरी बार सरकार होने से असम की जनता हमेशा से कांग्रेस के हाथो ठगी जाती है। असम में होने वाले छोटे से छोटे चुनाव को यहाँ की भोली भाली जनता उसे एक बड़े पर्व के रूप में देखती है और देखे भी क्यों ना उन पर लाखो का खर्च जो किया जाता है यहाँ की जनता के हर एक वोट को पैसे में तोलकर जो देख जाता है। हाल ही में हुए असम पंचायत चुनाव में पैसे को पानी की तरह किस तरह बहाया गया है इसकी बानगी मैंने खुद अपनी आँखों से देखी। जब एक ग्राम पंचायत बनने के लिए  30 लाख रूपये और एक ब्लाक प्रमुख बनने के लिए 60 लाख रूपये खर्च कर सकता है तो असम के विकास की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है ......

असम के बराक वेळी के तीन जिले (कछार, करीमगंज, हैलाकांडी ) विकास की हालत पर आज भी रोने रा रहे है। असम के इन इलाको की कांग्रेस सरकार को कोई सुध नहीं है। कांग्रेस पार्टी को इन्ही इलाको में सबसे ज्यादा सीटें भी मिलती है और हाल ही में हुए असम पंचायत चुनाव में कांग्रेस पार्टी के सबसे ज्यादा उम्मीदवार यही से जीते लेकिन हर बार की तरह बराक वेळी हमेशा से अपने को ठगा हुआ महसूस करती है। यहाँ का युवा वर्ग कांग्रेस पार्टी के हाथो की कठपुतली बना हुआ है कारण बस यही की यहाँ के सभी युवा वर्ग पहले ही वोट के बदले नोट में तब्दील हो जाते है। इन इलाको में सर्व शिक्षा अभिमान के तहत प्राइमरी स्कूलों की हाताल देखने पर ही पता चलता है कि पैसे का किस तरह से दुरूपयोग किया जाता है बेरोजगारी और भ्रष्टाचार अपनी चर्म  सीमा पर है। आखिर जब मैंने इन इलाको को देखा तो में एक बार सोचने पर इसलिए मजबूर हो गया है कि आखिर असम की जनता ने कांग्रेस को कैसे तीसरी बार सत्ता तक पहुचाया। इन तीनो इलाको में पनप रहे भ्रष्टाचार को लेकर असमी मीडिया क्यों चुप है और इन इलाको में दलितों एवं जनजतियों पर होने वाले उत्पीडन के मामले भी सबसे ज्यादा यही है लेकिन असम की मीडिया के लिए यह कोई खबर नहीं बनती आखिर क्यों ? क्या असमी मीडिया अपनी जिम्मेदारी से पीछे हट रहा है या फिर एक खास वर्ग तक ही सीमित है। बराक वेळी के अलावा आज भी यहाँ के अधिकतर हिस्सों के हालत कुछ ज्यादा खास नहीं है। यहाँ बड़े से बड़ी घटना कब और कैसे घट जाये यहाँ की लोकल और मेन स्ट्रीम मीडिया को कुछ पता ही नहीं चल पाता। लेकिन दिल्ली के मीडिया स्टूडियो में बेठाकर जो बहस की जाती है उससे असम की समस्या का हल नहीं निकल सकता।और यहाँ के बड़े से बड़े मामले को गन्दी राजनीती के चलते रफा - दफा कर दिया जाता है।  

बराक वेळी के हाफलोंग में पढने वाले एक छात्र से हुई बातचीत में पता चला कि असम में मीडिया की पहुच कुछ ज्यादा खास नहीं है इसकी पहुँच सिर्फ शहरो और शहर के आसपास वाले इलाको तक है और में एक मीडिया शोधार्थी होने नाते यह कह सकता हूँ कि असम में मीडिया की पहुँच मात्र 40 %फीसदी तक है बाकि 60% असम की जनता अभी भी इससे अनजान है। आखिर इतने बड़े गेप की भरपाई किस तरह से की जा सकती है। यह बड़ा ही एहम सवाल है असम की अवाम के लिए। असम में परिवहन भी एक बड़ी समस्या है जिसके कारण गावों और शहरों के बीच का फासला इतना ज्यादा है कि ये चाह कर संपर्क नहीं कर सकते। असम की जनता के लिए दिल्ली इतनी दूर है कि वो गुवाहाटी को ही दिल्ली समझ लेते है। असम का परिवहन विभाग हाथ पर हाथ धरे न जाने किसका इंतज़ार कर रहा है। इसलिए इन इलाकों में अधिकतर मौतें रास्ते में दम तोड़ देने से ही हो जाती है। असम का एक ओर सच अभी यह भी है कि जो मेरी यात्रा का हिस्सा रहा और जिसे में कभी भुलाया नहीं सकता। रेल मंत्री पवन कुमार बंसल ने एक सौ छह नई ट्रनों को चलाने की घोषना के साथ साथ यात्रियों की सुरक्षा के लेकर भी कुछ वादे किये।  लेकिन एक दिन के बाद ही यूपी के मुज़फ्फरनगर से चलती शताब्दी ट्रेन में से एक महिला को नीचे फेक दिया गया जिससे उसकी मौत हो गयी। आखिर पवन कुमार बंसल की घोषणा एक दिन में ही क्यों धरासायी हो गयी? असम की रेलवे का सच अब आगे----          

गुवाहाटी से करीब एक सौ अस्सी किलोमीटर की दूरी पर लामडिंग सिटी है जहा से सिलचर जाने के लिए ट्रेन मिलती है। सिलचर तक पहुँचने का बस एक मात्र यही रास्ता है जहा से सुबह और शाम में मात्र दो ट्रेने चलती है अगर एक ट्रेन छूट जाये तो पूरे` दिन का वेट करना पड़ता है और शाम में ट्रेन छूट जाये तो पूरी रातभर वेट करना पड़ेगा। लामडिंग से सिलचर की दूरी मात्र दो सौ सोलह किलोमीटर है। वैसे यह दूरी ट्रेन के हिसाब से कोई ज्यादे मायने नहीं रखती लेकिन इस रूट पर लामडिंग से सिलचर के रेल प्रोजेक्ट का काम करीब पिछले पच्चीस सालो से चल रहा है। जिसका पच्चीस फीसदी भी काम अभी तक पूरा नहीं हुआ यह काम अब तक इसलिए पूरा नहीं हो पाया है कि स्थानीय नेताओं की यहाँ दादागिरी चलती है और यह सारा खुला खेल तरुण गोगई सरकार की आखों के सामने हो रहा है। गुवाहाटी से ट्रेन दुवारा सिलचर तक पहुँचने में करीब 18 घंटे लगते है इसीलिए यहाँ की जनता के लिए गुवाहाटी ही दिल्ली है। रेलवे विभाग के लिए ये बड़े शर्म की बात है। इसीलिए बराक वेळी के तीनो जिले (कछार, करीमगंज, हैलाकांडी ) आज तक नही उभर पा रहे है। जिस रेल प्रोजेक्ट पर भारतीय रेलवे करोडो रूपये खर्च करती है और रेल मंत्री के संसद में बैठकर बड़ी - बड़ी  घोषणाये करते है क्या उससे भारतीय रेलवे के हालत सुधर पाएंगे? कहना मुश्किल है। रेल बजट के पूरे दिन मीडिया जगत सुबह से ही रेल बजट को फोकस करने में लगा हुआ था।  क्या कभी असमी मीडिया या मेन स्ट्रीम ने इस मुद्दे को संसद तक पहुचाया? अगर ये मुद्दा देश की संसद के पटल रखा जाये तो बराक वेळी की हालत काफी सुधर सकती है। अगर रेलमंत्री को भारतीय रेल का इतना ही ख्याल है तो फिर बराक वेळी के कभी आकर आकर देखे कि किस तरह की राजनीती चलती है। मंत्री जी अगर ये रेलवे प्रोजेक्ट पूरा हो जाये तो बराक वेळी की जनता अपने को भारत से जुडा हुआ महसूस करेगी। वरना बराक वेळी में बांग्लादेश से आये हुए माइग्रेंट लोगो की तादात लगातार बढती जा रही है ओर देख लेना एक दिन ऐसा आएगा कि भारत का यही हिस्सा बांग्लादेश का हिस्सा बनकर रह जायेगा।

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