15 फ़र॰ 2014

बंगाल, भाजपा और मोदी


ज़ेहन में जब भी भाजपा का नाम बंगाल को लेकर याद किया जाता है तो यह मन से इसलिए नहीं उतरता क्योंकि बंगाल में भाजपा चारों खाने चित है । इस संगठन को यहाँ मजबूती देना वाला कोई है नहीं । अगर भाजपा बंगाल में मोदी के आसरे केसरिया फहराना चाहती है तो यह अभी दूर की गोटी होगी यानि जिस बंगाल में भाजपा का ताना बाना अस्सी के दशक में बुना गया था । वह अभी तक अपना कोई खास असर नहीं छोड़ पाया है । भाजपा के लिए बंगाल को लेकर सवाल इसलिए बड़ा हो चला है क्योंकि  बंगाल पर अगर उसे फतह हासिल करनी है तो यह अकेले मोदी के बूते संभव नहीं, ऐसे में भाजपा की मुश्किल यह है कि वह जाये तो जाये किसके साथ? बंगाल का वर्तमान राजनीतिक अंकगणित यह बताता है कि मोदी वामपंथ के साथ इसीलिए नहीं जा सकते क्योंकि उन्होंने कोलकता रैली के ज़रिए पहले ही संकेत देकर यह जतला दिया था कि वामपंथ ने देश को थर्ड ग्रेड बनाने का काम किया है । ममता ने यूपीए से नाता तोड़कर अभी किसी दल की ओर जाने के संकेत नहीं दिए है । कांग्रेस वामपंथ के साथ इसलिए जा सकती है क्योंकि कांग्रेस के लिए वामपंथ के अलावा अब कोई विकल्प नहीं है । वैसे भी कांग्रेस के खाते में मालदा की एकमात्र लोकसभा सीट है । यह सीट भी गनी खान चौधरी और उनके परिवार के प्रभाव के चलते मुमकिन हो सकी, लेकिन अब गनी खान नहीं हैं और उनके भाई विधायक अबू नासेर ने भी राज्यसभा चुनाव में तृणमूल के ही पक्ष में मतदान किया । 
             
ऐसे में यह स्थिति इस बात का संकेत देती है कि बंगाल में भी आम चुनाव से पहले सभी राजनीतिक दलों में एक अजीब सी बेचैनी है । 2011 के विधानसभा चुनाव की हार से वामपंथ पहले ही सदमें है और इसी के चलते वामपंथ का जनाधार भी छिटकता जा रहा है । ममता बनर्जी ने बंगाल का किला अगर माँ, माटी मानुष के आसरे हासिल किया तो उनके सामने राज्य को विकास की पटरी पर लाने के लिए अभी बहुत सी चुनौतियां है । लेकिन पिछले कई महीनों से ममता सरकार की जो फज़ीहत देखने को मिली उससे तो यही लगता है कि जनता का विश्वास अब टीएमसी पर से उठने लगा है । ममता ने भले ही कोलकाता रैली के ज़रिए यह बताने की कोशिश की हो कि देश में तृणमूल कांग्रेस ही बस एक विकल्प बचा है और महाश्वेता देवी भी ममता की तारीफों के पूल बांधते हुए यह जतला दे कि ममता भी देश के प्रधानमंत्री पद की दौड़ में शामिल है, यानि मतलब साफ है कि ममता को अब विरोधियों को अपने पक्ष में करने का महारत हासिल हो चूका है करीब सात बरस पहले जो महाश्वेता देवी नंदीग्राम घटना के दौरान ममता के विरोध में खड़ी थी, आज वही ममता के साथ खड़ी है । कैसा अजीब संयोग है ! कहते हैं कि राजनीति में सब कुछ मुमकिन है । लेकिन अब समय बदल चूका है दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनने के बाद पार्टी की नज़र अब देश के सभी बड़े महानगरों पर जा टिकी है । बंगाल में आये दिन पार्टी कार्यकर्ताओं की संख्या बढती देख टीएमसी को एक नया विकल्प अब मैदान में दिखने लगा है ।     

बंगाल में भाजपा, जहाँ मोदी के आसरे बंगाल की लाल ज़मीन को केसरिया में बदलना चाहती है, वहीँ  कोलकाता रैली में उमड़ी भीड़ से मोदी को बंगाल में लोकसभा चुनाव से पहले ही परिवर्तन की खुशबू आने लगी है । आज मोदी 2014  के आम चुनाव की उस दहलीज़ पर जा खड़े है जहाँ से उन्हें अब लाल किले का लाल रंग दिखाई देने लगा है यानि मोदी का सपना बंगाल में केसरिया फहराना है और 2014 में 272 के आंकड़े को भी छूना है । बंगाल में भाजपा को मोदी के ज़रिए इतिहास रचना होगा तभी लाल बंगाल को केसरिया में बदला जा सकता है । सपनों के पंख लगाये मोदी देश भर में जाकर गुजरात के विकास मंत्र से भाजपा के लिए ज़मीन तैयार करने में लगे है । इस मंत्र का असर कितना  पड़ेगा यह तस्वीर कुछ ही महीनो में साफ़ हो जाएगी । भाजपा ने 2001 के विधानसभा चुनाव में भी बंगाल में केसरिया फहराना चाहा था लेकिन हासिल कुछ भी नहीं हो सका । बंगाल में भाजपा के लिए सवाल इसलिए बड़ा ज़रूर है क्योंकि भाजपा अगर दक्षिण (कर्नाटक) राज्य में केसरिया फहरा सकती है तो बंगाल में क्यों नहीं?    

बंगाल में मोदी ने रैली के ज़रिए जो बाण वामपंथियों पर साधे उसकी धमक से थर्ड फ्रंट में भी एक हलचल ज़रूर पैदा हुई । लेकिन मोदी ने इशारों ही इशारों पर ममता की तारीफों के कसीदे भी पढ़े । ममता किस ओर जाएँगी यह अभी कुछ साफ़ नहीं है, क्योंकि अगर याद करें तो 2004 में जब अटल बिहारी वाजपेयी कोलकाता आये थे तो ममता ने ही अटल जी के साथ मंच साझा किया था यानि जो छवि अटल जी की एनडीए में रही, वो मोदी है नहीं । बंगाल में भाजपा तो अटल सरकार के समय में भी नहीं थी ।  लेकिन जिस छवि के आसरे ममता ने भाजपा का दामन थामा था वैसी छवि अब भाजपा की नहीं है । ममता के लिए सवाल अब भाजपा का नहीं, बल्कि उसके चिंता का कारण है कि अगर वामपंथ फिर से अपना खोया हुआ जनाधार खड़ा कर गया तो वह अपनी ज़मीन गँवा सकती है । भाजपा को बंगाल में अधिक सीटें मिलना थोडा मुश्किल है । क्योंकि यहाँ पार्टी संगठन कहीं न कहीं मजबूत नहीं है । लेकिन भाजपा का वोट प्रतिशत ज़रूर बढ़ सकता है । प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार मोदी बंगाल को जो आईना गुजरात विकास मन्त्र के ज़रिए दिखाकर गए हैं । यह छवि कितनी साफ़ होगी इस पर आम चुनाव के बाद ही कुछ कहा जा सकता है  

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