10/08/2010

ये दोस्ती दिवस या फिर कोई और दिवस ज़रा सोचिये ........



दोस्ती दिवस यानि फ़्रेन्डशिप डे.... दोस्तों इन दिनों मेरा देहरादून किसी काम से आना हुआ है ॥ ०१ अगस्त कों मेरे परम मित्र विवेक मिश्रा का सुबह -सुबह मेरे पास फोन आया....... और उसने सीधे -सीधे मुझे फोन पर दोस्ती दिवस की बधाई दे डाली और कहा मित्र आपको फ्रेंडशिप डे की लख लख बधाईया एक बार तो में सोच में पड गया की मेरा मित्र किस लिए मुझे बधाई दे रहा है। जब उसने कहा मित्र आज आज दोस्ती दिवस है । इस लिए आपको बधाई दे रहा हूँ । ..... क्या आपको नहीं पता आज फ्रेंडशिप डे है ........? मैंने कहा नहीं तो ।........................ फिर मैंने उसको सीधे- सीधे बताया की मित्र देखो एक दिन के लिए फ्रेंडशिप डे कह देने से लोग सदा के लिए दोस्त नहीं बनते दोस्ती होती है तो बस दिल से ............ अगर आपके लिए किसी के प्रति ज़रा सा भी प्रेम , इसनेह , दया , जैसी भावना है तभी आपकी दोस्ती आगे बढ़ सकती है .................
.........खेर .... मैंने मदर डे, फादर डे, किस डे , रोज़ डे। परेंट्स डे ...................... इन सभी के बारे मैंने अक्सर सुना है पर इस फ्रेंडशिप डे कों पहिले बार सुना (मेरे लिए तो पहिले बार लेकिन ओरो के लिए शायद कितने ही बार हो ..........)मुझे नहीं पता मेरे भारत में कितने दिवस रोज़ मनाये जाते है... जैसे १ अगस्त कों मेरा किसे काम से सिटी के अंदर जाना हुआ तो तो मैंने देखा शहर की तमाम सिटी बसों में नव युवक जोड़ो की भीड़ देखने कों मिली, साथ ही साथ शहर की तमाम दुकाने और रेस्टोरेंट कों सजते हुए देखा गया । जंहा पर हर नव युवक अपनी महिला मित्र के लिए हैण्डबैंड और फूल जैसी चीज़े खरीदते हुए दिखाई पड़े ............परेड ग्राउंड (देहरादून ) के पास गाँधी पार्क आज इन लोगो के लिए ये मीटिंग पॉइंट बना हुआ था । जब में इस गार्डन में गया तो मैंने देखा की पार्क के हर एक में नव युवक अपनी महिला मित्र कों लेकर बेठे थे ..............पार्क की ऐसी कोई भी भी जंगह नहीं थी जंहा पर में बेठ सकता ..... लेकिन मेरे बेठने के लिए वह पर जंगह नहीं थी । देहरादून का गाँधी पार्क शहर का सबसे बड़ा पार्क माना जाता है। अब इस बात से अंदाज़ा लगा सकते है की की पार्क में कितनी भीड़ होगी और बगीचे के अंदर नव युवक जोड़ो की चहल कदमी करते हुए देखे गया । एक दुसरे से बात करके कहते की आप बहुत ही अच्छे हो। तो कोई कहता की आप मेरा ज़िन्दगी भर साथ दोगी न इस परकार के तमाम वाकये सुनने कों मिले ............. लेकिन मेरे भारत की इस यंग ब्लड जेनरेसन कों आखिर हो क्या गया .... जो देश की संस्क्रती कों डूबने पर तुली है .... अगर उनमे से में किसे ये पूछ लेता की देश में कुछ चले रहा है तो शायद ही कोई बता पाता .... लेकिन नहीं वेस्टर्न कल्चर कों आगे बढ़ने में लगे हुए है .......... देहरादून में मेने यंहा के युवको में एक अलग सा ट्रेंड देखा जो मैंने भोपाल में भी नहीं देखा .........भारतीय कल्चर की धजजी उड़ाते ये युवक क्या आपनी साख बचा पाएंगे या फिर प्रेम की चाह रखने वाले ये युवक डिप्रेसन का शिकार होंगे बिलकुल हमारे दोस्त सनसनी की तरह ? इन का भविष्य क्या होगा कहना मुश्किल है ................ जब मेरी नज़र जब वंहा पर बेठे गेर महिला मित्र युवको पर गयी तो मैंने पाया की ये युवक अपनी मानसिकता के साथ गुना भाग लगा रहे थे .... .

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